मिट्टी बचाओ, भविष्य संवारो :एसबीएसयू में जैविक खेती पर जोर
देहरादून। खेत की मिट्टी केवल अनाज उगाने का माध्यम नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और आने वाले भविष्य की सबसे मजबूत आधारशिला है। इसी संदेश के साथ सरदार भगवान सिंह विश्वविद्यालय में शुक्रवार को “भूमि सुपोषण एवं संरक्षण” राष्ट्रीय जनजागरण अभियान के तहत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। बदलते कृषि परिदृश्य, बढ़ते रासायनिक उपयोग और घटती मिट्टी की उर्वरता के बीच विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि टिकाऊ कृषि की दिशा में अब जैविक और संतुलित खेती ही सबसे व्यवहारिक और दीर्घकालिक समाधान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मिट्टी स्वस्थ रहेगी तो ही किसान की आय, फसल की गुणवत्ता और देश की खाद्य व्यवस्था सुरक्षित रह सकेगा।
कृषि विज्ञान एवं वानिकी विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के अध्यक्ष एसपी सिंह ने अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस अवसर पर अतिथियों का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. जे कुमार ने रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बदलती जीवनशैली के बीच जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है और उपभोक्ता स्वास्थ्य के प्रति सजग हो रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में जैविक खेती किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी।
उन्होंने कहा कि हरित क्रांति के दौर में भारत ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाया, जिनमें उच्च उत्पादक किस्मों के बीज, सिंचाई और रासायनिक उर्वरकों का व्यापक उपयोग शामिल था। 1960 के दशक के अंत से रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग तेजी से बढ़ा, जिससे उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और देश खाद्यान्न संकट से उबर सका। हालांकि, समय के साथ इन रसायनों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता, जल गुणवत्ता और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव भी सामने आने लगे, जिससे संतुलित और टिकाऊ खेती की आवश्यकता महसूस हुई।
राज्य समन्वयक ललित बुड़ाकोटी ने अभियान की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही मजबूत राष्ट्र की नींव है। तकनीकी सत्र में प्रगतिशील किसान दीपक उपाध्याय ने प्राकृतिक खेती के अपने अनुभव साझा किए, जबकि डॉ. निधि बेलवाल ने मृदा में सूक्ष्मजीवों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मृदा की जैविक कार्बन मात्रा बढ़ाने के लिए गोबर खाद या वर्मी कम्पोस्ट का नियमित उपयोग आवश्यक है, जिससे मिट्टी की उर्वरता और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ती है।
पूर्व निदेशक, आईसीएआर–काजरी, डॉ. आरके भट्ट ने “जलवायु-स्मार्ट कृषि” पर व्याख्यान देते हुए बदलते जलवायु परिदृश्य में मृदा और जल संरक्षण की आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने फसल चक्र, मल्चिंग और संतुलित उर्वरक उपयोग को मृदा संरक्षण के लिए प्रभावी उपाय बताया।
कार्यक्रम के दौरान आयोजित छात्र संवाद सत्र में बीएससी (ऑनर्स) कृषि के छात्र-छात्राओं ने मृदा परीक्षण, जैविक खेती और सरकारी योजनाओं से जुड़े प्रश्न पूछे। संचालन सृष्टि मेहतानी ने किया।
समापन अवसर पर अध्यक्ष एसपी सिंह ने छात्रों से इस जनजागरण अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मिट्टी हमारी अमूल्य धरोहर है, जिसका संरक्षण भविष्य की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।
अंत में प्रभारी असिस्टेंट प्रोफेसर अनिल पंवार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में 70 से अधिक प्रतिभागियों ने “मिट्टी बचाओ” की शपथ ली।
इस अवसर पर प्रो. उर्मी चौरसिया (परीक्षा नियंत्रक), श्रीमती हेमलता भट्ट (एग्रो फॉरेस्ट्री, सहायक प्रोफेसर), प्रिया रावत (एग्रोनॉमी), डॉ. अनामिता सेन (सहायक प्रोफेसर, पादप रोग विज्ञान), डॉ. कुलजीत कौर (एसोसिएट प्रोफेसर, प्रबंधन अध्ययन), पियाली शर्मा (सहायक प्रोफेसर) सहित अनेक प्राध्यापक, किसान एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
मृदा स्वास्थ्य के लिए वैज्ञानिक सिफारिशें
देहरादून। “भूमि सुपोषण एवं संरक्षण” अभियान के तहत विशेषज्ञों ने किसानों को मृदा, फसल और पर्यावरण के संतुलित संरक्षण के लिए व्यवहारिक और वैज्ञानिक उपाय अपनाने की सलाह दी। कार्यक्रम में टिकाऊ कृषि को भविष्य की जरूरत बताते हुए संतुलित उर्वरक उपयोग और जैविक विकल्पों पर विशेष जोर दिया गया।
मृदा परीक्षण से तय करें उर्वरक की मात्रा
विशेषज्ञों ने किसानों को हर 2–3 वर्ष में मृदा परीक्षण कराने की सलाह दी। इससे मिट्टी की उर्वरता, पीएच स्तर और पोषक तत्वों की सही जानकारी मिलती है, जिससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग संभव होता है और लागत भी घटती है।
जैविक खाद से बढ़ेगी मिट्टी की ताकत
गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद के उपयोग पर जोर देते हुए बताया गया कि इससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है और सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं।
फसल चक्र अपनाकर बढ़ाएं उत्पादन
दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने की सलाह दी गई, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। मिश्रित खेती और हरी खाद से मृदा संरक्षण और कीट नियंत्रण में भी मदद मिलती है।
मल्चिंग और कंटूर फार्मिंग से रुकेगा कटाव
ढालू जमीन में कंटूर फार्मिंग और मल्चिंग तकनीक अपनाने से मृदा अपरदन कम होता है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई से जल संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
जैविक उपायों से करें कीट नियंत्रण
रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर नीम आधारित और जैविक उपाय अपनाने की सलाह दी गई। एकीकृत कीट प्रबंधन से फसल सुरक्षित रहती है और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव कम पड़ता है।
जलवायु स्मार्ट तकनीकों पर जोर
न्यूनतम जुताई और शून्य जुताई तकनीकों को अपनाने से मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है। खेतों के किनारों पर पेड़-पौधे लगाकर हरित क्षेत्र विकसित करने की भी सलाह दी गई।
संतुलित खेती ही टिकाऊ समाधान
विशेषज्ञों ने कहा कि रासायनिक और जैविक उर्वरकों का संतुलित उपयोग ही दीर्घकाल में बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सेहत बनाए रख सकता है।

