उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल पहचान दे रहा वीडियोज अलार्म; चर्चित फिल्म “निखण्यां जोग” हुई OTT पर रिलीज़
  • “निखण्यां जोग” की OTT एंट्री, वीडियोज अलार्म बना उत्तराखंडी सिनेमा का नया डिजिटल घर

देहरादून। उत्तराखंड की क्षेत्रीय फिल्म इंडस्ट्री लगातार नए आयाम स्थापित कर रही है। इसी क्रम में निर्देशक देबू रावत द्वारा निर्देशित चर्चित गढ़वाली फीचर फिल्म “निखण्यां जोग” अब उत्तराखंड के पहले समर्पित क्षेत्रीय OTT प्लेटफॉर्म वीडियोज अलार्म (Videos Alarm) पर रिलीज़ हो चुकी है।

फिल्म का निर्माण आशा मुनीन्द्र सकलानी ने किया है, जबकि निर्देशन देबू रावत द्वारा किया गया है। फिल्म के सह-निर्देशक एवं कोरियोग्राफर विजय भारती हैं। संगीत निर्देशन अमित वी कपूर द्वारा किया गया है। फिल्म में पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण, अमित खरे, प्रतीक्षा बमराड़ा और लेखराज भंडारी ने अपनी मधुर आवाज़ दी है। प्रमुख कलाकारों में मोहित घिल्डियाल, प्राची पंवार, मानसी शर्मा, रवि ममगाईं, पुरुषोत्तम जेठुड़ी, सुषमा व्यास, डॉ. एम.आर. सकलानी, अजय सिंह बिष्ट, राजेश जोशी, हर्ष खत्री, विनीता नेगी, अंशिका भारती और पूनम नैथानी शामिल हैं।

“निखण्यां जोग” उत्तराखंड की सामाजिक वास्तविकताओं पर आधारित एक संवेदनशील कहानी है, जो पलायन, पारिवारिक जिम्मेदारियों, संघर्ष और भाग्य की अनिश्चितताओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। फिल्म पहाड़ की संस्कृति, जीवनशैली और मानवीय भावनाओं को दर्शाते हुए दर्शकों से गहरा जुड़ाव स्थापित करती है।

“निखण्यां जोग” की डिजिटल रिलीज़ के साथ एक बार फिर चर्चा में आया है वीडियोज अलार्म, जिसे उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल मंच प्रदान करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। Coloured Checkers Films & Entertainment Pvt. Ltd. द्वारा संचालित यह प्लेटफॉर्म गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी भाषाओं की फिल्मों, संगीत, लोक संस्कृति और वृत्तचित्रों को एक ही मंच पर उपलब्ध करा रहा है।

“अपनी बोली, अपना स्वैग” के नारे के साथ संचालित वीडियोज अलार्म आज दुनिया भर में बसे उत्तराखंडियों को अपनी मातृभाषा और संस्कृति से जोड़ने का कार्य कर रहा है। मात्र ₹99 वार्षिक सदस्यता के साथ उपलब्ध यह प्लेटफॉर्म Android, iOS और Android TV पर भी सुलभ है, जिससे दर्शक कहीं भी और कभी भी अपनी पसंदीदा क्षेत्रीय सामग्री का आनंद ले सकते हैं। प्लेटफॉर्म पर “निखण्यां जोग” के अलावा शहीद, रतब्याण, धर्ती म्यार कुमाऊं की और मीठी मां कु आशीर्वाद जैसी चर्चित क्षेत्रीय फिल्में भी उपलब्ध हैं।

इस अवसर पर गोपाल सिंह बिष्ट, सेल्स हेड, वीडियोज अलार्म ने कहा, “हमारा उद्देश्य केवल मनोरंजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की भाषा, संस्कृति और लोक पहचान को डिजिटल माध्यम से नई पीढ़ी और वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाना है। आज के व्यस्त जीवन में हर व्यक्ति के लिए सिनेमाघर तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता। ऐसे में वीडियोज अलार्म दर्शकों को घर बैठे, अपनी सुविधा और समय के अनुसार क्षेत्रीय फिल्मों और सांस्कृतिक सामग्री का आनंद लेने का अवसर प्रदान करता है। Android, iOS और Android TV पर उपलब्ध होने के कारण दर्शक कहीं भी और कभी भी अपनी पसंदीदा उत्तराखंडी फिल्में देख सकते हैं। ‘निखण्यां जोग’ जैसी फिल्मों की OTT रिलीज़ क्षेत्रीय सिनेमा को नई संभावनाएं प्रदान करेगी और स्थानीय कलाकारों व फिल्म निर्माताओं के लिए एक मजबूत डिजिटल मंच तैयार करेगी।

टिहरी गढ़वाल की आध्यात्मिक धरोहर बूढ़ा केदार : आस्था, इतिहास और प्रकृति का अद्भुत संगम, जहां पांडवों को वृद्ध रूप में मिले थे भगवान शिव
  • बूढ़ा केदार : टिहरी गढ़वाल की आध्यात्मिक धरोहर – पंच केदार परंपरा का प्राचीन तीर्थ

टिहरी : उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद के भिलंगना विकासखंड में बालगंगा और धर्मगंगा नदियों के पवित्र संगम पर स्थित बूढ़ा केदार मंदिर सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। पंच केदार परंपरा के प्राचीन तीर्थों में गिने जाने वाले इस पावन धाम को भगवान शिव के वृद्ध स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है। आध्यात्मिक महत्व, पौराणिक मान्यताओं, प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण बूढ़ा केदार आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

पौराणिक मान्यता से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत ने बताया कि स्कन्द पुराण के छठवें अध्याय के अनुसार बूढ़ा केदार का इतिहास इस क्षेत्र के कई अन्य प्रसिद्ध केदारनाथ तीर्थों से भी पुराना है। इस मंदिर की यात्रा किए बिना चारों धाम की यात्रा सफल नहीं मानी जाती है। बूढ़ा केदार मंदिर समिति के सदस्य मनमोहन रावत के अनुसार स्कंद पुराण में वर्णित कथाओं के आधार पर इस तीर्थ का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है।  महाभारत युद्ध के बाद ब्रह्म और गोत्र के हत्या के पापों से मुक्ति पाने के लिए अपने गुरू वेदव्यास से मुक्ति का मार्ग पूछा तथा गुरू वेदव्यास ने पांडवों से कहा उत्तर हिमालय की दिशा में भगवान शिव के दर्शन से गोत्र हत्या के पापों से मुक्ति मिल जाएगी। पांडव भगवान शिव का आर्शीवाद खोजते हुए हिमालय आए थे। भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देने से बचने के लिए एक वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण किया था। जब पांडव इस स्थान पर पहुँचे, तो वह वृद्ध व्यक्ति ध्यान में लीन हो गया और अचानक एक विशाल शिवलिंग प्रकट हुआ। यहीं पर पाडवों ने शिवलिंग के रूप में शिव जी के दर्शन किए, जिसके कारण इस जगह का नाम बूढ़ा केदार पड़ा।

प्राकृतिक शिवलिंग और अनूठी परंपराएं

मंदिर समिति अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि यहां स्थापित प्राकृतिक शिवलिंग उत्तर भारत के सबसे बड़े प्राकृतिक शिवलिंगों में से एक माना जाता है। शिवलिंग में भगवान शिव, गणेश, नंदी, पांचों पांडवों तथा द्रौपदी की आकृतियां उकेरी हुई दिखाई देती हैं। मंदिर पारंपरिक गढ़वाली वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो अपने उत्कृष्ट शिल्प कौशल और नक्काशीदार लकड़ी और पत्थर के जटिल संयोजन के लिए जाना जाता है। जिसमें लकड़ी और पत्थर की सुंदर नक्काशी विशेष आकर्षण का केंद्र है।

मंदिर परिसर में नाथ संप्रदाय के संतों की समाधियां भी स्थित हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार महान योगी गुरु गोरखनाथ ने भी यहां तपस्या की थी। इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि यहां पुजारी का दायित्व राजपूत समुदाय के वे लोग निभाते हैं, जिन्होंने नाथ संप्रदाय की परंपरागत शिक्षा प्राप्त की होती है।  मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी स्थापित हैं।

प्रकृति की गोद में बसा है पावन धाम

समुद्र तल से लगभग 1,535 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बूढ़ा केदार नई टिहरी से करीब 90 किलोमीटर दूर घनसाली क्षेत्र में स्थित है। देवदार के घने जंगलों, सीढ़ीनुमा खेतों और पर्वतीय प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह क्षेत्र आध्यात्मिक शांति और सुकून का अनुभव कराता है। 

मेलों और उत्सवों में उमड़ती है आस्था

महाशिवरात्रि बूढ़ा केदार का सबसे प्रमुख पर्व है, जिसमें हजारों श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा जुलाई माह की पूर्णिमा से आरंभ होने वाला तीन दिवसीय मेला भी क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक आयोजन माना जाता है। गुरु कैलापीर देवता, जिन्हें लगभग 180 गांवों का इष्ट देवता माना जाता है, का भव्य मेला भी दीपावली के लगभग एक माह बाद बड़े उत्साह के साथ आयोजित किया जाता है। 

ऐसे पहुंच सकते हैं बूढ़ा केदार

ऋषिकेश और नई टिहरी से घनसाली के लिए नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। घनसाली से निजी वाहन या टैक्सी के माध्यम से मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। अंतिम चरण में बूढ़ा केदार सड़क पर स्थित लोहे के पुल से लगभग एक किलोमीटर का सुगम और मनोहारी पैदल मार्ग तय करना पड़ता है। जो आसान और मनोरम ट्रेक है। मार्च से जून तथा सितंबर से नवंबर तक का समय यहां भ्रमण के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस अवधि में मौसम सुहावना रहता है और गढ़वाल हिमालय के मनोरम दृश्य यात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। बूढ़ा केदार महासर ताल, सहस्त्रताल, जराल ताल और मनझार ताल जैसे प्रसिद्ध उच्च हिमालयी तालों की ट्रैकिंग का भी प्रमुख प्रवेश द्वार है।

स्मृतियों में जीवित रहेंगे रावल अमरनाथ योगी

बूढ़ा केदार की हमारी यात्रा के दौरान हमें रावल अमरनाथ योगी से साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिन्होंने बूढ़ा केदार मंदिर के इतिहास, पौराणिक महत्व और परंपराओं के विषय में अत्यंत सरल और गहन जानकारी साझा की। उनके शब्दों में इस पावन धाम की आस्था और अध्यात्म की जीवंत झलक स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती थी। यह भेंट न केवल जानकारीपूर्ण रही, बल्कि इस दिव्य स्थल की सांस्कृतिक आत्मा को समझने का एक सशक्त माध्यम भी बनी। दुर्भाग्यवश, हाल ही में उनके स्वर्गवास का समाचार प्राप्त हुआ, जिससे यह स्मृति और भी अधिक भावुक एवं अविस्मरणीय हो गई है। बूढ़ा केदार की यह यात्रा आज भी उनकी स्मृतियों और मार्गदर्शन के प्रकाश में जीवंत प्रतीत होती है।

आस्था और विरासत का जीवंत प्रतीक

बूढ़ा केदार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि गढ़वाल की सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक है। यहां आकर श्रद्धालु जहां आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं, वहीं इतिहास, परंपरा और प्रकृति के अद्भुत संगम से भी रूबरू होते हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस पर योग पार्क स्थापना, योग सत्र एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम संपन्न

हरिद्वार : विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मॉडल कॉलोनी पार्क, अपोजिट प्रेम नगर आश्रम, हरिद्वार में प्रातः 6:30 बजे योग पार्क स्थापना, सामूहिक योग सत्र एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन उत्साहपूर्वक संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य जनसामान्य को योग के प्रति जागरूक करना, नियमित योगाभ्यास हेतु स्थायी व्यवस्था विकसित करना तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामाजिक सहभागिता को बढ़ावा देना था।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. अतुल सिंह नेगी, अपर जिला आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी, हरिद्वार ने योग पार्क का शुभारंभ करते हुए कहा कि योग स्वस्थ जीवन की आधारशिला है तथा वृक्षारोपण प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज में स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति सकारात्मक संदेश प्रसारित करते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अश्वनी कौशिक, आयुर्वेद विशेषज्ञ एवं मनीषी द्वारा की गई। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक स्वास्थ्य का माध्यम नहीं बल्कि मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक संतुलन स्थापित करने का प्रभावी साधन है। उन्होंने योग पार्क को क्षेत्रीय नागरिकों के लिए स्वास्थ्य संवर्धन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बताया।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. पूजा राय, प्रभारी अधिकारी द्वारा किया गया। उन्होंने सभी अतिथियों, योग साधकों एवं क्षेत्रवासियों का स्वागत करते हुए योग पार्क स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डाला तथा योग को दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान किया।

योग सत्र का संचालन प्रतिमा सैनी, शालू चौहान एवं दीपक पांडे द्वारा किया गया। उन्होंने उपस्थित प्रतिभागियों को विभिन्न योगासन, प्राणायाम एवं ध्यान की विधियों का अभ्यास कराया तथा योग के नियमित अभ्यास से होने वाले स्वास्थ्य लाभों की जानकारी दी।

कार्यक्रम की व्यवस्थाओं में डॉ विकास दुबे, अजय तिवारी, मनीष सजवाण एवं रविन्द्र पोखरियाल का विशेष योगदान रहा। वहीं नवीन थपलियाल, चीफ फार्मेसी अधिकारी द्वारा जलपान एवं अतिथि सत्कार की व्यवस्थाओं का सफल संचालन किया गया।

स्थल व्यवस्था, स्वच्छता एवं सहयोगात्मक कार्यों में रघुवीर सिंह, अंकुर सैनी एवं सतीश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम के दौरान स्वास्थ्य सहायता एवं आवश्यक सहयोग हेतु शीतल एवं कंचन, स्टाफ नर्स भी उपस्थित रहीं।

कार्यक्रम के सफल आयोजन में श्रुति कटियार (डीपीएम, हरिद्वार) तथा व्योम त्यागी (डेटा एंट्री ऑपरेटर) द्वारा व्यवस्थापन, समन्वय, प्रलेखन, फोटोग्राफी एवं जनसंपर्क संबंधी कार्यों में सक्रिय सहयोग प्रदान किया गया।

इस अवसर पर क्षेत्र के 50 से अधिक योग साधकों, महिलाओं, युवाओं एवं वरिष्ठ नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। सामूहिक योगाभ्यास के उपरांत सभी प्रतिभागियों द्वारा विभिन्न छायादार एवं औषधीय पौधों का वृक्षारोपण किया गया तथा उनके संरक्षण एवं संवर्धन का संकल्प लिया गया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने “योग करें – स्वस्थ रहें, वृक्ष लगाएं – पर्यावरण बचाएं” का सामूहिक संदेश देते हुए पर्यावरण संरक्षण एवं स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की शपथ ली।

डॉ. स्वास्तिक सुरेश, जिला आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी, हरिद्वार ने अपने संदेश में कहा कि जनपद में योग एवं आयुष आधारित जनस्वास्थ्य गतिविधियों को निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है। योग पार्क जैसी पहलें समाज को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने हेतु प्रेरित करती हैं तथा समुदाय आधारित स्वास्थ्य संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय, विशेषज्ञ, राष्ट्रीय आयुष मिशन, हरिद्वार ने अपने संदेश में कहा कि योग एवं पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ समाज और स्वस्थ पर्यावरण की अवधारणा को साकार करने के लिए ऐसे जनभागीदारी आधारित कार्यक्रम अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने आयोजन टीम को इस अभिनव पहल के लिए शुभकामनाएं प्रेषित कीं।

जन सहभागिता से ही होगा पर्यावरण संरक्षण, उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र में विश्व पर्यावरण दिवस पर संगोष्ठी आयोजित

देहरादून : विश्व पर्यावरण दिवस पर यूसैक मे आयोजित कार्यशाला मे पर्यावरण संरक्षण में अंतरिक्ष प्रोधोगिकी की भूमिका को रेखांकित किया गया । विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (यू-सैक) द्वारा पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के समाधान में अंतरिक्ष प्रोधोगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया। कार्यशाला मे वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के प्राध्यापकों द्वारा प्रतिभाग किया गया।

प्रथम सत्र मे संगोष्ठी की संयोजक यूसैक की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ अरुण रानी ने कहा कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में वन, जल स्रोत, हिमनद, जैव विविधता तथा आपदा संभावित क्षेत्रों की निगरानी एवं प्रबंधन के लिए उपग्रह आधारित सुदूरसंवेदी (Remote Sensing) एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जा रहा है। इन आधुनिक तकनीकों के माध्यम से भूमि उपयोग एवं भू-आवरण परिवर्तन, वनाग्नि, भूस्खलन, हिमनदों में परिवर्तन तथा जल संसाधनों की स्थिति का वैज्ञानिक विश्लेषण संभव हो रहा है। यूसैक द्वारा विकसित भू-स्थानिक डेटाबेस एवं निर्णय सहयोगी प्रणालियां राज्य सरकार के विभिन्न विभागों को पर्यावरणीय योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सहयोग प्रदान कर रही हैं। उपग्रह आंकड़ों के उपयोग से जलागम विकास, वनीकरण, आपदा प्रबंधन तथा जलवायु अनुकूल विकास योजनाओं को भी सुदृढ़ बनाया जा रहा है।साथ ही ड्रोन प्रोधोगिकी और भू-स्थानिक तकनीकों का समन्वित उपयोग पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल रहा है।

केंद्र के वैज्ञानिक डॉ गजेन्द्र सिंह कार्यक्रम में वानिकी एवं पारिस्थितिकी प्रभाग के वैज्ञानिक डॉ गजेन्द्र सिंह ने उत्तराखण्ड की समृद्ध जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान प्रणाली तथा स्थानीय समुदायों की पर्यावरण संरक्षण में भूमिका पर विस्तृत प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि उत्तराखण्ड के वन, जलस्रोत,पर्वत, नदियाँ तथा जैव विविधता केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं,बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक एवं सामाजिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड की भोटिया, राजी, थारू,बोक्सा एवं जौनसारी जैसी जनजातियाँ तथा स्थानीय समुदाय सदियों से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। औपचारिक कानूनों और नियमों के अभाव में भी स्थानीय समाज ने पवित्र वनों, देव-वनों, नौला,धारों,गौचर भूमि तथा पारंपरिक सामाजिक व्यवस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की प्रभावी परंपरा विकसित की है। वेदों, पुराणों तथा लोक साहित्य में प्रकृति संरक्षण को धर्म और संस्कृति से जोड़ा गया है। उत्तराखण्ड की लोक परंपराएँ लोकगीत,स्थानीय स्थानों के नाम तथा पारंपरिक ज्ञान प्रणालियाँ पर्यावरणीय चेतना को पीढ़ी.दर.पीढ़ी हस्तांतरित करती रही हैं। वर्तमान समय में जैव विविधता ह्रास, जलवायु परिवर्तन तथा प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के ज्ञान एवं सहभागिता को भी समान महत्व देना होगा। कार्यक्रम में उत्तराखण्ड के विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों के अनुरूप स्थानीय एवं देश, प्रजातियों के रोपण, जल स्रोतों के संरक्षणए संसाधनों के सतत उपयोग तथा नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया गया।

यूसैक की वैज्ञानिक डॉ सुषमा गैरोला ने कहा कि स्थानीय जनसहभागिता की मदद से पर्यावरण को दूषित होने से बचाया जा सकता है उन्होंने पर्यावरण संरक्षण हेतु यूसैक द्वारा सुदूरसंवेदी (Remote Sensing) एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तकनीकों के व्यापक उपयोग से क्रियान्वित की जा रही मानव जनित कूड़े के डम्पिंग साइट जोन चिनहाँकन परियोजना के बारे मे प्रतिभागियों को अवगत कराया ।

संगोष्ठी के दूसरे सत्र मे वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक आचार्य डॉ सूरज ने कहा किवर्तमान मे बढ़ते शहरीकरण के फलस्वरूप बढ़ते कंक्रीट के जंगल भी पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं, बढ़ते शहरीकरण के कारण भूमि और डामर कि परतें बढ़ने से मिट्टी कि जलधारण एवं जल अवशोषण क्षमता मे कमी आ रही है जिस कारण भूजल पुनर्भरण घट रहा है ,सतही अपवाह बढ़ता है तथा बाढ़ लैंसलाइड और जल संकट कि संभावनाएं बढ़ जाती है। जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करती है ।

वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के ऐप्लाइएड साइंस विभाग कि सहायक आचार्य डॉ सुरभि भट्ट ने पॉलिथीन एवं फर्टिलाइजर पदार्थों के बढ़ते उपयोग से पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान हो रहा है। हमारे द्वारा प्रयोग की जाने वाली पॉलिथीन मिट्टी एवं जलश्रोतो मे लंबे समय तक रहकर पर्यावरण को दूषित करती है यह सैकड़ों वर्षों तक भी उसी स्थिति मे रहती है । ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों द्वार अत्यधिक फर्टिलाइजर के उपयोग से मिट्टी कि उर्वरता घटी है और नाइट्रेट भूजल मे मिल कर जलप्रदूषण उत्पन्न करते हैं। हमें पॉलिथीन के उपयोग मे कमी और उर्वरकों के संतुलित प्रयोग एवं वर्मी कम्पोसीट खाद एवं हरित खाद के अधिक उपयोग से मिट्टी एवं जल प्रदूषण को प्रभावी रूप से कम करना होगा।

वीर माधो सिंह भण्डारी उत्तराखंड प्रोधोगिकी विश्वविध्यालय, देहारादून के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक आचार्य डॉ परितोष ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर नागरिकों से पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों के संवर्धन, वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग हेतु सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया गया।

इस अवसर पर यूसैक के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ प्रियदर्शी उपाध्याय ,वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी श्री आर एस मेहता, वैज्ञानिक -डॉ नीलम रावत, डॉ आशा थपलियाल, पुष्कर कुमार द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु अपने अपने विचार प्रस्तुत किए गए । विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यू-सैक परिसर मे अतिथियों एवं प्रतिभागियों द्वारा पौधारोपण किया गया ।

संगोष्ठी में यूसैक के प्रशानिक अधिकारी आरएस मेहता, वरिष्ठ वैज्ञानिक – प्रियदर्शी उपाध्याय, वैज्ञानिक- डॉ सुषमा गैरोला, डॉ आशा थपलियाल,डॉ नीलम रावत, डॉ गजेन्द्र सिंह, शशांक लिंगवाल, पुष्कर कुमार, डॉ दिव्य उनियाल, देवेश कपरवान, मीन पंत आदि समस्त कार्मिकों एवं शोधार्थियों द्वारा प्रतिभाग किया गया ।

संस्कृत, संस्कृति और तकनीक का संगम; उत्तराखण्ड से दुनिया तक पहुंचेगी भारतीय ज्ञान परंपरा, दिल्ली में बनी कार्ययोजना

नई दिल्ली/देहरादून। संस्कृत शिक्षा के संवर्धन, भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक प्रचार-प्रसार तथा नवीन शैक्षिक परियोजनाओं को गति देने के उद्देश्य से उत्तराखण्ड शासन के सचिव संस्कृत शिक्षा, जनगणना एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन दीपक कुमार के नेतृत्व में 1 से 3 जून 2026 तक नई दिल्ली में विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों, संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित की गईं। बैठकों में संस्कृत शिक्षा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने, रोजगारपरक पाठ्यक्रम विकसित करने तथा डिजिटल एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पहल को बढ़ावा देने पर व्यापक चर्चा हुई।

उत्तराखण्ड शासन के सचिव संस्कृत शिक्षा, जनगणना एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन, उत्तराखंड शासन दीपक कुमार के नेतृत्व में 1 से 3 जून 2026 के मध्य नई दिल्ली में भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित की गईं। इन बैठकों में संस्कृत शिक्षा के संवर्धन, भारतीय ज्ञान परम्परा के वैश्विक प्रसार तथा नवीन शैक्षिक परियोजनाओं के साथ-साथ कार्यक्रम क्रियान्वयन पर भी व्यापक चर्चा हुई।

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की महानिदेशक के साथ हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया कि उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार द्वारा भारतीय संस्कृति, कर्मकाण्ड, ज्योतिष, जन्मपत्रिका निर्माण तथा भारतीय ज्ञान परम्परा जैसे विषयों पर षाण्मासिक के साथ-साथ त्रैमासिक प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम भी तैयार किए जाएंगे। इन पाठ्यक्रमों को ऑनलाइन माध्यम से संचालित किया जाएगा तथा इनके वैश्विक प्रचार-प्रसार एवं नामांकन में ICCR सहयोग प्रदान करेगा। इससे संस्कृत में देश-विदेश में रोज़गार की संभावना को बल मिलेगा. साथ ही विदेश मंत्रालय के ICCR डीवीजन के सहयोग से 20-21 दिसम्बर 2026 को हरिद्वार संस्कृत विश्वविद्यालय में विश्व ध्यान दिवस के आयोजन का भी निर्णय लिया गया।

विदेश मंत्रालय के साथ हुई बैठक में संस्कृत के विद्वानों एवं शिक्षकों को विदेशों में रोज़गार अवसर उपलब्ध कराने तथा संस्कृत में रचित वैश्विक महत्व की पुस्तकों के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हेतु सहयोग प्रदान करने पर विचार-विमर्श किया गया।

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित परियोजनाओं को भारत AI मिशन के अंतर्गत प्रस्तुत करने तथा संस्कृत शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।

संस्कृति मंत्रालय में विश्वविद्यालय की ओर से राजमाता अहिल्याबाई होल्कर के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आधारित एक महत्वपूर्ण शोध-परियोजना आर्थिक सहायता हेतु प्रस्तुत की गई। साथ ही उत्तराखंड के संस्कृत के मूर्धन्य आचार्य पंडित दिनेश जोशी की जन्म शताब्दी के अवसर पर संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से हरिद्वार में एक विश्वव्यापी गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा । शिक्षा मंत्रालय के साथ बैठक में उत्तराखण्ड संस्कृत शिक्षा परिषद, देहरादून को डिजिटाइज करने के विषय पर सकारात्मक चर्चा हुई।

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी के साथ हुई बैठक में उत्तराखण्ड में संस्कृत शिक्षा के विस्तार, पुस्तकालय विकास योजनाओं तथा प्रदेश के विभिन्न जनपदों में संस्कृत शिक्षण केन्द्र स्थापित करने की संभावनाओं पर विचार करने के साथ-साथ संस्कृत ग्राम सुदृढीकरण एवं पायलट आधारित किसी एक जनपद को संस्कृत आच्छादित करने का सुझाव दिया गया। विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को उपलब्ध छात्रवृत्तियों एवं शोधवृत्तियों के संबंध में भी आवश्यक जानकारी साझा की गई।

इसके अतिरिक्त दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट के साथ शिष्टाचार भेंट के दौरान उत्तराखण्ड एवं दिल्ली के मध्य संस्कृत शिक्षा के प्रचार-प्रसार को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। इस दौरान सचिव दीपक कुमार के साथ उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ प्रकाश चंद्र पंत व डॉ सुमन प्रसाद भट्ट एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ सुनील जोशी भी उपस्थित थे। दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष ने उत्तराखण्ड में संस्कृत शिक्षा के विकास हेतु हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। बैठकों के उपरान्त सचिव दीपक कुमार ने संबंधित संस्थाओं को लिए गए निर्णयों पर शीघ्र कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश दिए, जिससे संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त हो सके।