लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से दिल (Heart) की बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक बेहद राहत देने वाली खबर सामने आई है। अब तक जिन मरीजों को हार्ट वॉल्व (Heart Valve) की समस्या के चलते ओपन हार्ट सर्जरी (Open Heart Surgery) के दर्दनाक और जोखिम भरे रास्ते से गुजरना पड़ता था, उन्हें अब एक नई और आधुनिक तकनीक का तोहफा मिला है। शहर के हृदय रोग संस्थान (Heart Disease Institute) ने 'तावी' (TAVI - Transcatheter Aortic Valve Implantation) विधि से इलाज शुरू करने का फैसला किया है। सबसे बड़ी खुशखबरी यह है कि निजी अस्पतालों में जिस इलाज का खर्च 15 से 20 लाख रुपये आता है, वह यहां पूरी तरह मुफ्त (Free) होगा।READ ALSO:-यूपी में वोटरों पर 'कागज' का संकट: 2003 की लिस्ट में नाम नहीं तो 'निवास प्रमाण पत्र' भी बेकार; आयोग ने कहा- 'सिर्फ ये 11 सबूत चलेंगे' इसके साथ ही, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) भी हार्ट ट्रांसप्लांट (Heart Transplant) के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन डोनर (अंगदान करने वाले) न मिलने के कारण यह प्रक्रिया रुकी हुई है। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर यह 'तावी' तकनीक क्या है, मरीजों को इसका लाभ कैसे मिलेगा और अंगदान को लेकर क्या चुनौतियां सामने आ रही हैं। इतिहास में पहली बार: लखनऊ में फ्री 'तावी' (TAVI) सर्जरी मेडिकल साइंस ने पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व तरक्की की है, और Lucknow TAVI Surgery की यह पहल उसी दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। हृदय रोग संस्थान के वरिष्ठ चिकित्सकों के अनुसार, वॉल्व की बीमारी से ग्रस्त मरीजों के लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है। अभी तक की स्थिति यह थी कि जब भी किसी मरीज के दिल का वॉल्व खराब होता था या उसमें सिकुड़न आ जाती थी, तो डॉक्टरों के पास केवल 'ओपन हार्ट सर्जरी' ही एकमात्र विकल्प बचता था। इसमें मरीज की छाती को चीरकर ऑपरेशन किया जाता है, जिसमें रिकवरी का समय लंबा होता है और संक्रमण का खतरा भी बना रहता है। विशेषकर बुजुर्ग मरीजों के लिए ओपन सर्जरी जानलेवा साबित हो सकती है। लेकिन 'तावी' विधि ने इस पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। क्या है तावी (TAVI) तकनीक? 'तावी' यानी ट्रांसकैथेटर एरोटिक वॉल्व इंप्लाटेशन (Transcatheter Aortic Valve Implantation)। यह एक 'मिनिमली इनवेसिव' (Minimally Invasive) प्रक्रिया है। बिना चीर-फाड़ के इलाज: इस विधि में छाती को चीरने की जरूरत नहीं पड़ती। जांघ की नस से रास्ता: डॉक्टरों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में मरीज की जांघ (Groin) की नस (Femoral Artery) के जरिए एक कैथेटर (पतली नली) को दिल तक पहुंचाया जाता है। नया वॉल्व: इसी कैथेटर के जरिए सिकुड़े हुए या खराब वॉल्व के स्थान पर एक नया कृत्रिम वॉल्व (Artificial Valve) फिट कर दिया जाता है। वॉल्व कवच: यह नया वॉल्व पुराने वॉल्व के अंदर फिट होकर एक 'कवच' की तरह काम करता है और रक्त प्रवाह को सुचारू रूप से बहाल कर देता है। 30 मरीजों पर होगा पहला परीक्षण: डॉ. संतोष सिन्हा हृदय रोग संस्थान के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. संतोष सिन्हा ने इस नई पहल के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया शुरू करने के लिए संस्थान पूरी तरह तैयार है। "पहले चरण में हम ऐसे 30 मरीजों का चयन करेंगे जिन्हें वॉल्व बदलने की सख्त जरूरत है। इन मरीजों पर Lucknow TAVI Surgery विधि से वॉल्व इम्प्लांटेशन का परीक्षण किया जाएगा। सरकार की तरफ से हरी झंडी मिलते ही इसे बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया जाएगा।" — डॉ. संतोष सिन्हा डॉ. सिन्हा ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश भर के चुनिंदा 9 अस्पतालों को इस विधि से इलाज करने के लिए चिन्हित किया है, जिनमें लखनऊ का हृदय रोग संस्थान भी शामिल है। यह उत्तर प्रदेश के लिए गर्व की बात है। लाखों की बचत: 15 लाख का इलाज अब 0 रुपये में भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का महंगा होना आम आदमी की कमर तोड़ देता है। ऐसे में यह खबर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए संजीवनी समान है। खर्च का गणित: निजी अस्पताल: यदि कोई मरीज किसी प्राइवेट हॉस्पिटल या कॉरपोरेट अस्पताल में TAVI विधि से वॉल्व बदलवाता है, तो उसका औसतन खर्च 15 लाख रुपये से 20 लाख रुपये के बीच आता है। वॉल्व की कीमत ही लाखों में होती है। सरकारी संस्थान (लखनऊ): डॉ. संतोष सिन्हा के अनुसार, हृदय रोग संस्थान में यह इलाज पूरी तरह से फ्री (Fully Free) रहेगा। किसे नहीं देना होगा शुल्क: सरकार से मिले निर्देशों के मुताबिक, चयनित मरीजों को वॉल्व की कीमत या सर्जरी का कोई भी शुल्क नहीं देना होगा। यह पूरा खर्च सरकार वहन करेगी। यह कदम उन गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को नई जिंदगी देगा जो पैसों की कमी के कारण अपना इलाज बीच में ही छोड़ देते थे। KGMU: सब कुछ तैयार, बस 'दिल' का इंतजार एक तरफ जहां हृदय रोग संस्थान में वॉल्व सर्जरी की नई शुरुआत हो रही है, वहीं दूसरी तरफ लखनऊ का प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) हार्ट ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ा है। KGMU के सीवीटीएस (CVTS) विभाग ने हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम, अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर और सभी जरूरी उपकरण तैयार कर लिए हैं। लेकिन विडंबना यह है कि सारी तैयारियों के बावजूद अभी तक एक भी ट्रांसप्लांट नहीं हो पाया है। इसकी वजह है—अंगदान (Organ Donation) की कमी। जागरूकता की कमी बनी रोड़ा KGMU की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि तकनीक और संसाधनों के स्तर पर विश्वविद्यालय पूरी तरह सक्षम है, लेकिन समाज में अभी भी अंगदान को लेकर भ्रांतियां और जागरूकता की कमी है। "हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए 'ब्रेन डेड' (Brain Dead) मरीज के परिजनों की सहमति जरूरी होती है। दुखद है कि लोग अभी भी अंगदान के महत्व को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे हैं। एक व्यक्ति का अंगदान कई लोगों को नई जिंदगी दे सकता है।" — प्रो. सोनिया नित्यानंद, कुलपति, KGMU जागरूकता अभियान: अब गांव-गांव पहुंचेंगे डॉक्टर अंगदान की इस खाई को पाटने के लिए KGMU प्रशासन ने एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। विश्वविद्यालय अब केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोगों के बीच जाकर उन्हें जागरूक करेगा। क्या है रणनीति? कैंप और सेमिनार: लखनऊ और आसपास के जिलों में विशेष जागरूकता शिविर लगाए जाएंगे। सामाजिक संगठनों का सहयोग: डॉक्टरों के साथ-साथ एनजीओ (NGOs) और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद ली जाएगी। काउंसलिंग: अस्पतालों में ब्रेन डेड घोषित मरीजों के परिजनों की काउंसलिंग के लिए विशेष टीमें बनाई जाएंगी जो उन्हें अंगदान के लिए प्रेरित कर सकें। प्रस्ताव की तैयारी: इस अभियान को प्रभावी बनाने के लिए जल्द ही एक प्रस्ताव पारित किया जाएगा। अन्य अंगों के प्रत्यारोपण में KGMU की प्रगति भले ही हार्ट ट्रांसप्लांट में डोनर की कमी आड़े आ रही हो, लेकिन अन्य अंगों के प्रत्यारोपण में KGMU ने बेहतरीन काम किया है। लिवर और किडनी: वर्तमान में यहां लिवर (Liver) और किडनी (Kidney) ट्रांसप्लांट की सुविधा सुचारू रूप से चल रही है और सैकड़ों मरीजों को इसका लाभ मिला है। फेफड़ा प्रत्यारोपण (Lung Transplant): केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि जल्द ही फेफड़ा प्रत्यारोपण की सुविधा भी शुरू करने की तैयारी चल रही है। हार्ट ट्रांसप्लांट: अब जैसे ही कोई डोनर मिलेगा, सीवीटीएस विभाग पहला हार्ट ट्रांसप्लांट करके प्रदेश में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा। लखनऊ के चिकित्सा क्षेत्र में हो रहे ये बदलाव बताते हैं कि उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। हृदय रोग संस्थान में Lucknow TAVI Surgery का मुफ्त होना न केवल चिकित्सा विज्ञान की जीत है, बल्कि यह लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को भी मजबूत करता है। 15 लाख रुपये की बचत और चीर-फाड़ रहित इलाज निश्चित रूप से हजारों मरीजों की जान बचाएगा। वहीं, KGMU की तैयारियां यह इशारा करती हैं कि भविष्य उज्ज्वल है, बस जरूरत है तो सामाजिक सोच में बदलाव की। अंगदान महादान है—इस मंत्र को जन-जन तक पहुंचाना अब केवल सरकार या डॉक्टरों की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम अंगदान के प्रति जागरूक होते हैं, तो न जाने कितने घरों के चिराग बुझने से बच सकते हैं। लखनऊ के हृदय रोग संस्थान में दिल के वॉल्व की बीमारी का इलाज अब 'तावी' (TAVI) विधि से मुफ्त में किया जाएगा, जिसके लिए निजी अस्पतालों में 15 लाख रुपये लगते हैं। पहले चरण में 30 मरीजों का इलाज होगा। वहीं, KGMU में हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारियां पूरी हैं, लेकिन अंगदान (डोनर) न मिलने के कारण प्रक्रिया रुकी हुई है, जिसके लिए अब जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
देहरादून (ब्यूरो रिपोर्ट)। देवभूमि उत्तराखंड की शांत वादियां जल्द ही देश के एक सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सा और वैज्ञानिक संवाद की गवाह बनने वाली हैं। भारत के समक्ष वर्तमान में खड़ी कुपोषण की पुरानी समस्या और आधुनिक युग के तेजी से बढ़ते 'जीवनशैली जनित रोगों' (Lifestyle Diseases) की दोहरी चुनौती से निपटने के लिए देश के दिग्गज चिकित्सा विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता देहरादून में एक साझा मंच पर एकत्रित होंगे।READ ALSO:-मोटर व्हीकल एक्ट में ऐतिहासिक बदलाव: अब 16 साल के बच्चे भी बनवा सकेंगे ड्राइविंग लाइसेंस, लेकिन भारी वाहन चालकों के लिए अग्निपरीक्षा; जानिए 2025 के नए नियम न्यूट्रिशन काउंसिल ऑफ इंडिया (NCI) और राजकीय दून मेडिकल कॉलेज (GDMC) के संयुक्त तत्वावधान में 'द्वितीय राष्ट्रीय पोषण एवं जनस्वास्थ्य सम्मेलन (NCICON 2026)' का आयोजन किया जा रहा है। यह दो दिवसीय महासम्मेलन 21 और 22 फरवरी 2026 को राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के भव्य प्रांगण में आयोजित होगा। मुख्य अतिथि: स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत करेंगे शुभारंभ सम्मेलन के आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में उत्तराखंड सरकार की सक्रिय भागीदारी रहने वाली है। उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथि (Chief Guest) के रूप में अपनी गरिमामयी उपस्थिति के लिए सहमति प्रदान कर दी है। वे ही इस राष्ट्रीय सम्मेलन का विधिवत उद्घाटन करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सम्मेलन न केवल राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देगा, बल्कि चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में भी एक मील का पत्थर साबित होगा। क्यों अनिवार्य है यह सम्मेलन? दोहरी चुनौतियों का समाधान आज भारत एक ऐसी स्थिति में है जहाँ उसे एक साथ दो विपरीत मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है। न्यूट्रिशन काउंसिल ऑफ इंडिया (NCI) के अध्यक्ष डॉ. क्षितिज भारद्वाज ने सम्मेलन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत आज एक अजीब दोराहे पर खड़ा है। कुपोषण (Malnutrition): देश के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आज भी बच्चों और महिलाओं में कुपोषण एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। जीवनशैली रोग: इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में खराब खान-पान और शारीरिक सक्रियता की कमी के कारण डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोग जैसी बीमारियां महामारी की तरह फैल रही हैं। डॉ. भारद्वाज के अनुसार, "NCICON 2026 वैज्ञानिक संवाद, नवाचार और नीति-उन्मुख समाधानों के लिए एक प्रभावी मंच प्रदान करेगा, जो नैदानिक पोषण (Clinical Nutrition) को सीधे जनस्वास्थ्य (Public Health) के साथ जोड़ने का काम करेगा।" देशभर के दिग्गज विशेषज्ञों का जमावड़ा देहरादून का यह सम्मेलन चिकित्सा जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियों के आगमन का साक्षी बनेगा। इस आयोजन में शामिल होने वाले प्रमुख विशेषज्ञों की सूची में निम्नलिखित नाम शामिल हैं: विशेषज्ञ का नाम पद एवं संस्थान प्रो. सी.एम. सिंह निदेशक, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (RMLIMS), लखनऊ। प्रो. नरसिंह वर्मा केजीएमयू (KGMU), लखनऊ के पूर्व विभागाध्यक्ष। पद्मश्री प्रो. कमलाकर त्रिपाठी वरिष्ठ चिकित्सक, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)। डॉ. केंजोम नोगमदिर मुख्य चिकित्सा अधिकारी, सीआरपीएफ (CRPF)। प्रो. राखी अग्रवाल डीन, राष्ट्रीय फॉरेंसिक साइंसेज विश्वविद्यालय। इन दिग्गजों के अलावा, एम्स (AIIMS) ऋषिकेश, सीएसआईआर (CSIR) और देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के लगभग 200 प्रतिनिधि और 100 से अधिक शोधार्थी (Researchers) अपने नवीनतम शोध पत्र (Research Papers) प्रस्तुत करेंगे। सम्मेलन के मुख्य आकर्षण: किन विषयों पर होगा मंथन? सम्मेलन का एजेंडा व्यापक और बहुआयामी है। दो दिनों तक चलने वाले सत्रों में निम्नलिखित विषयों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी: रोग निवारण में पोषण की भूमिका: कैसे सही खान-पान बीमारियों को होने से पहले ही रोक सकता है। मेटाबॉलिक सिंड्रोम: मोटापा, मधुमेह (Diabetes) और उनसे जुड़े जोखिमों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण। खाद्य सुरक्षा और विषाक्तता (Food Safety and Toxicity): मिलावट और खाद्य पदार्थों में मौजूद हानिकारक तत्वों की पहचान और रोकथाम। सतत खाद्य प्रणाली: पोषण शिक्षा और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित खाद्य संसाधनों की उपलब्धता। सम्मान और प्रोत्साहन: चिकित्सा जगत के सितारों को मिलेगा पुरस्कार सम्मेलन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू चिकित्सा सेवा में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को सम्मानित करना है। 'न्यूट्रिशन काउंसिल ऑफ इंडिया' द्वारा इस वर्ष निम्नलिखित राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे: प्रो. नरसिंह वर्मा उत्कृष्टता पुरस्कार: यह सम्मान अहमदाबाद के विख्यात डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. बंसी साबू को उनके मधुमेह प्रबंधन (Diabetes Management) में किए गए अतुलनीय कार्य के लिए दिया जाएगा। प्रो. कमलाकर त्रिपाठी उत्कृष्टता पुरस्कार: यह सम्मान प्रो. सी.एम. सिंह को चिकित्सा शिक्षा और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके असाधारण नेतृत्व के लिए प्रदान किया जाएगा। आयोजन समिति का दृष्टिकोण: शोध से नीति तक की दूरी राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के जैवरसायन (Biochemistry) विभाग के अध्यक्ष और इस सम्मेलन के आयोजन सचिव प्रो. (डॉ.) राजीव कुशवाहा ने आयोजन की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि "पोषण किसी भी राष्ट्र के स्वास्थ्य की आधारशिला है।" उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह सम्मेलन शोध (Research), चिकित्सा अभ्यास (Practice) और नीति (Policy) के बीच की खाई को पाटने का काम करेगा। 'स्वस्थ भारत' की परिकल्पना की ओर एक कदम देहरादून में आयोजित होने वाला यह NCICON 2026 सम्मेलन न केवल उत्तराखंड के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह देश की भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों के लिए एक रूपरेखा भी तैयार करेगा। युवा शोधार्थियों और वैज्ञानिकों के लिए यह एक स्वर्णिम अवसर है, जहाँ वे वरिष्ठ विशेषज्ञों से सीखकर 'स्वस्थ भारत' की परिकल्पना को धरातल पर उतारने में मदद कर सकेंगे। (यह विस्तृत रिपोर्ट न्यूट्रिशन काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति और आधिकारिक इनपुट्स पर आधारित है।)
भारतीय घरों में सिरदर्द, बदन दर्द या बुखार होने पर डॉक्टर के पास जाने के बजाय सीधे मेडिकल स्टोर से दवा खरीदकर खाने की आदत बेहद आम है। 'हरे पत्ते वाली गोली' या 'तेज दर्द की दवा' के नाम से मशहूर निमेसुलाइड (Nimesulide) दशकों से भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाली पेनकिलर्स (Painkillers) में से एक रही है। लेकिन, अगर आप भी छोटी-मोटी तकलीफ में इस दवा की हाई डोज लेते हैं, तो यह खबर आपको सावधान करने वाली है।READ ALSO:-सावधान! आपका Smart TV भी बन सकता है जासूस; अगर दिखें ये संकेत तो समझो हैक हो गया है आपका डाटा आज, 31 दिसंबर 2025 को साल के जाते-जाते केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने जनहित में एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला लिया है। सरकार ने निमेसुलाइड की 100 मिलीग्राम (mg) से अधिक क्षमता वाली ओरल (खाने वाली) दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध (Ban) लगा दिया है। सरकार का यह कदम उन मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञ पैनल की सलाह के बाद आया है, जिनमें दावा किया गया था कि निमेसुलाइड की अनियंत्रित और उच्च खुराक भारतीय मरीजों के लिवर (Liver) को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है। कई मामलों में तो यह लिवर फेलियर का कारण भी बन रही थी। आइये, इस विस्तृत रिपोर्ट में समझते हैं कि सरकार को यह कदम क्यों उठाना पड़ा, यह दवा आपके शरीर के अंगों को कैसे निशाना बनाती है, और प्रतिबंध के बाद अब आम जनता के लिए क्या विकल्प बचे हैं। 1. सरकार का आदेश: क्या बदला है और क्या नहीं? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रतिबंध का दायरा क्या है। क्या निमेसुलाइड पूरी तरह बंद हो गई है? जवाब है- नहीं। प्रतिबंध की बारीकियां: 100mg की लक्ष्मण रेखा: स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि प्रतिबंध केवल उन दवाओं (टैबलेट/कैप्सूल/सिरप) पर लागू होगा जिनमें निमेसुलाइड की मात्रा 100mg से अधिक है। उदाहरण के लिए, बाजार में उपलब्ध 200mg की सस्टेंड-रिलीज (SR) टैबलेट्स अब अवैध मानी जाएंगी। तत्काल प्रभाव: यह आदेश तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है। सरकार ने दवा निर्माता कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे 100mg से अधिक डोज वाली दवाओं का उत्पादन तुरंत बंद करें और बाजार में मौजूद स्टॉक को वापस मंगवाएं (Recall)। क्या उपलब्ध रहेगा? 100mg या उससे कम क्षमता वाली निमेसुलाइड दवाएं अभी भी बाजार में उपलब्ध रहेंगी, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि इनका सेवन भी केवल रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर (Doctor) की सलाह और पर्चे पर ही किया जाए। 2. क्यों खतरनाक है यह 'जादुई' पेनकिलर? (The Science Behind The Ban) निमेसुलाइड एक नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है। यह शरीर में उन रसायनों (Prostaglandins) को बनने से रोकती है जो दर्द और सूजन का कारण बनते हैं। यही वजह है कि इसे खाने के कुछ ही मिनटों में दर्द गायब हो जाता है। लेकिन यह 'जादुई राहत' एक बड़ी कीमत वसूलती है। लिवर पर सीधा हमला (Hepatotoxicity): विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट के अनुसार, निमेसुलाइड का मेटाबॉलिज्म (पचना) मुख्य रूप से लिवर में होता है। एंजाइम में गड़बड़ी: शोध में पाया गया है कि 100mg से अधिक की खुराक लेने पर यह लिवर के एंजाइम्स को खतरनाक स्तर तक बढ़ा देती है। इसे चिकित्सा भाषा में हेपेटोटॉक्सिसिटी (Hepatotoxicity) कहा जाता है। लिवर फेलियर: जो लोग लंबे समय तक या हाई डोज में इस दवा का सेवन करते हैं, उनमें पीलिया (Jaundice) और गंभीर मामलों में एक्यूट लिवर फेलियर (Acute Liver Failure) के मामले देखे गए हैं। कई बार यह डैमेज इतना गंभीर होता है कि मरीज को लिवर ट्रांसप्लांट की नौबत आ जाती है। अनियंत्रित डोज: भारत में समस्या यह थी कि लोग बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से दवा लेते थे और कई बार दिन में 2-3 बार हाई डोज खा लेते थे, जिससे खतरा कई गुना बढ़ जाता था। 3. वैश्विक परिदृश्य: दुनिया ने पहले ही कर दी थी 'नमस्ते' भारत में यह फैसला 2025 के अंत में लिया गया है, लेकिन दुनिया के कई विकसित देश बहुत पहले ही इस खतरे को भांप चुके थे। विकसित देशों का रुख: अमेरिका (USA), ब्रिटेन (UK), कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में निमेसुलाइड को कभी मंजूरी ही नहीं मिली या बहुत पहले ही प्रतिबंधित कर दिया गया। वहां के ड्रग रेगुलेटर्स का मानना था कि दर्द निवारण के लिए इबुप्रोफेन या पैरासिटामोल जैसे सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं, इसलिए लिवर खराब करने वाली दवा का जोखिम क्यों उठाया जाए? भारत में देरी क्यों? भारत में यह दवा सस्ती और आसानी से उपलब्ध होने के कारण बहुत लोकप्रिय थी। हालांकि, 2011 में सरकार ने 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए निमेसुलाइड के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी, क्योंकि बच्चों में इसके साइड इफेक्ट्स ज्यादा घातक थे। अब वयस्कों की सुरक्षा के लिए हाई डोज पर भी कैंची चला दी गई है। 4. आम जनता पर असर: अब क्या करें? इस प्रतिबंध का सीधा असर उन लाखों लोगों पर पड़ेगा जो जोड़ों के दर्द, बुखार या मासिक धर्म के दर्द के लिए नियमित रूप से इस दवा का सेवन करते थे। उपभोक्ता गाइडलाइन: पुरानी दवाएं चेक करें: आज ही अपने घर के फर्स्ट-एड बॉक्स (First Aid Box) की जांच करें। अगर आपके पास निमेसुलाइड की कोई ऐसी स्ट्रिप है जिस पर '200mg' या इससे अधिक की डोज लिखी है, तो उसे तुरंत डिस्पोज कर दें। उसका सेवन न करें। डॉक्टर से बात करें: अगर आप किसी पुराने दर्द (Chronic Pain) के लिए यह दवा ले रहे थे, तो अपने डॉक्टर से मिलें और डोज को एडजस्ट करवाएं या दवा बदलवाएं। सेल्फ-मेडिकेशन बंद करें: केमिस्ट से मांगकर 'तेज दर्द की दवा' खाना बंद करें। बिना जाने-समझे खाई गई हाई डोज पेनकिलर आपके लिवर और किडनी दोनों के लिए जहर समान हो सकती है। 5. विशेषज्ञों की राय: "विकल्प मौजूद हैं, घबराने की जरूरत नहीं" एम्स (AIIMS) और आईएमए (IMA) के वरिष्ठ चिकित्सकों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि दर्द प्रबंधन (Pain Management) के लिए सुरक्षा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। डॉक्टरों का सुझाव: सुरक्षित विकल्प: सामान्य बुखार और दर्द के लिए पैरासिटामोल (Paracetamol) सबसे सुरक्षित दवा मानी जाती है (सीमित मात्रा में)। अन्य NSAIDs: सूजन और तेज दर्द के लिए इबुप्रोफेन (Ibuprofen) या डायक्लोफेनाक (Diclofenac) का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन ये भी डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए। न्यूनतम प्रभावी खुराक: डॉक्टरों का कहना है कि किसी भी पेनकिलर का उपयोग "न्यूनतम समय के लिए और न्यूनतम प्रभावी खुराक" (Lowest effective dose for the shortest duration) के सिद्धांत पर करना चाहिए। 6. फार्मा कंपनियों के लिए निर्देश सरकार का यह आदेश दवा कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्हें तुरंत प्रभाव से अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में 100mg से ज्यादा वाली निमेसुलाइड का उत्पादन रोकना होगा। डिस्ट्रीब्यूटर्स और रिटेलर्स के पास मौजूद स्टॉक को वापस मंगवाने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। भविष्य में केवल निर्धारित मानकों (100mg या कम) वाली दवाओं की ही आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। स्वास्थ्य ही असली धन है दर्द से राहत पाना जरूरी है, लेकिन उसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाना समझदारी नहीं है। निमेसुलाइड पर सरकार का यह आंशिक प्रतिबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यह हमें याद दिलाता है कि हर दवा के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। जागरूक नागरिक बनें। किसी भी दवा को टॉफी या कैंडी की तरह न खाएं। अगर दर्द लगातार बना रहता है, तो उसका मूल कारण (Root Cause) जानने के लिए डॉक्टर से संपर्क करें, न कि पेनकिलर्स खाकर दर्द को दबाते रहें।
सर्दियों का मौसम (Winter Season) अपने साथ गुलाबी ठंड और कोहरे की चादर लेकर आता है, जो मन को तो बहुत भाता है, लेकिन हमारे शरीर—खासकर हमारे दिल (Heart)—के लिए यह मौसम किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। अक्सर आपने सुना होगा कि ठंड बढ़ते ही अस्पतालों में हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक के मरीज बढ़ जाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? इसका सबसे बड़ा और प्राथमिक कारण है—हाई ब्लड प्रेशर (High Blood Pressure) यानी हाइपरटेंशन।READ ALSO:-नमो भारत या 'शर्मसार' भारत? रैपिड रेल के CCTV से लीक हुआ स्कूली छात्र-छात्रा का 'प्राइवेट वीडियो', सुरक्षा के दावे फेल, NCRTC के कंट्रोल रूम में किसकी मिलीभगत? ठंड के मौसम का सीधा कनेक्शन हमारी हार्ट हेल्थ और ब्लड प्रेशर से है। कई लोग जो गर्मियों में बिल्कुल स्वस्थ महसूस करते हैं, सर्दियों में उन्हें अचानक सिर में भारीपन, घबराहट या सीने में जकड़न महसूस होने लगती है। अगर आपका ब्लड प्रेशर भी सर्दियों में अक्सर बढ़ जाता है, तो इसे मौसम का बदलाव समझकर नजरअंदाज न करें। यह आपकी कुछ अनजानी गलतियों का नतीजा हो सकता है जो अंदर ही अंदर आपके शरीर को खोखला कर रही हैं। आज की इस विशेष रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर पारा गिरते ही बीपी क्यों चढ़ने लगता है, हम अनजाने में कौन सी गलतियां करते हैं और बिना दवाइयों के इसे कैसे कंट्रोल किया जा सकता है। सर्दियों में बीपी बढ़ने का विज्ञान: शरीर के अंदर क्या होता है? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ठंड का हमारे सर्कुलेटरी सिस्टम (Circulatory System) पर क्या असर पड़ता है। जब बाहर का तापमान गिरता है, तो हमारे शरीर का 'सर्वाइवल मैकेनिज्म' एक्टिव हो जाता है। शरीर अपनी गर्मी (Body Heat) को बचाने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में हमारी रक्त धमनियां (Blood Vessels) सिकुड़ जाती हैं। मेडिकल भाषा में इसे 'वासोकंसट्रिक्शन' (Vasoconstriction) कहते हैं। इसे एक उदाहरण से समझें—जैसे सर्दियों में पानी का पाइप सख्त हो जाता है और सिकुड़ जाता है, ठीक वैसे ही हमारी नसें सिकुड़ जाती हैं। रास्ता संकरा होना: जब नसें सिकुड़ती हैं, तो खून के बहने का रास्ता संकरा हो जाता है। हार्ट पर दबाव: उस संकरे रास्ते से खून को पूरे शरीर में भेजने के लिए दिल को ज्यादा जोर (Force) लगाना पड़ता है। बढ़ा हुआ प्रेशर: दिल जितना ज्यादा जोर लगाएगा, धमनियों की दीवारों पर खून का दबाव उतना ही ज्यादा होगा। यही बढ़ा हुआ दबाव 'हाई ब्लड प्रेशर' कहलाता है। नॉर्मल vs हाई बीपी: नॉर्मल: 120/88 mm Hg से नीचे। इसका मतलब है दिल आराम से पंप कर रहा है और धमनियां लचीली हैं। हाई (खतरा): 140/90 mm Hg या इससे ऊपर। इसका मतलब है धमनियां टाइट हैं और दिल खतरे में है। इसके अलावा, ठंड में हमारा 'नर्वस सिस्टम' (Sympathetic Nervous System) ज्यादा एक्टिव हो जाता है, जिससे 'कैटेकोलामाइन्स' (Catecholamines) नामक हार्मोन का स्तर बढ़ता है। यह हार्मोन भी हार्ट रेट को बढ़ाता है और बीपी को शूट-अप करता है। सावधान! ये 5 गलतियां बन सकती हैं जानलेवा बीमारी केवल मौसम से नहीं, बल्कि हमारी खराब लाइफस्टाइल से भी बढ़ती है। सर्दियों में हम अपनी दिनचर्या में कुछ ऐसे बदलाव कर लेते हैं, जो बीपी के मरीजों के लिए जहर समान हैं। 1. फिजिकल एक्टिविटी का 'लॉकडाउन' (No Walking) सर्दियों में रजाई से निकलने का मन किसी का नहीं करता। लोग मॉर्निंग वॉक बंद कर देते हैं और जिम जाना छोड़ देते हैं। नुकसान: जब हम चलते-फिरते नहीं हैं, तो हमारा मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है। कैलोरी बर्न नहीं होती, वजन बढ़ता है और शरीर में 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' डेवलप होने लगता है। शारीरिक निष्क्रियता (Inactivity) बीपी बढ़ने का सबसे प्रमुख कारण है। 2. 'हीटर' का गलत इस्तेमाल (Heater Usage) यह पॉइंट बहुत कम लोग जानते हैं। ठंड से बचने के लिए हम दिन-रात कमरे में हीटर या ब्लोअर चलाकर रखते हैं। नुकसान: हीटर कमरे की हवा को बेहद ड्राई (Dry) कर देता है। साथ ही, जब आप गर्म कमरे से अचानक ठंडे माहौल में बाहर निकलते हैं, तो शरीर को 'थर्मल शॉक' लगता है। इससे स्ट्रेस हार्मोन ट्रिगर होते हैं और बीपी अचानक बढ़ जाता है। हवा में नमी की कमी भी सांस लेने में दिक्कत पैदा करती है, जो दिल पर दबाव डालती है। 3. पानी से दूरी (Dehydration) सर्दियों में प्यास नहीं लगती, इसलिए हम पानी पीना कम कर देते हैं। कई लोग तो दिन भर में सिर्फ 1-2 गिलास पानी ही पीते हैं। नुकसान: पानी की कमी से खून गाढ़ा (Viscous) हो जाता है। विज्ञान का नियम है—गाढ़े द्रव को पंप करने के लिए ज्यादा ताकत लगती है। इस गाढ़े खून को नसों में दौड़ाने के लिए दिल को एक्स्ट्रा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे बीपी बढ़ता है। साथ ही, डिहाइड्रेशन से शरीर में सोडियम का स्तर भी बिगड़ सकता है। 4. तली-भुनी और नमकीन डाइट (High Sodium Intake) सर्दियों में परांठे, पकौड़े, अचार और मसालेदार खाने की क्रेविंग बढ़ जाती है। नुकसान: भारतीय स्नैक्स और प्रोसेस्ड फूड में नमक (Sodium) बहुत ज्यादा होता है। सोडियम पानी को शरीर में रोककर रखता है (Water Retention)। शरीर में जितना ज्यादा फ्लूइड रुकेगा, नसों पर उतना ज्यादा दबाव पड़ेगा। नमक बीपी का सबसे बड़ा दुश्मन है। 5. धूप न लेना (Vitamin D Deficiency) सर्दियों में लोग घरों में दुबके रहते हैं। इससे शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है। कई रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि विटामिन डी की कमी सीधे तौर पर हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट रोगों से जुड़ी है। किन्हें है सबसे ज्यादा खतरा? (High Risk Groups) सर्दियों का मौसम हर किसी के लिए भारी हो सकता है, लेकिन कुछ विशेष लोगों को "रेड अलर्ट" पर रहने की जरूरत है: बुजुर्ग (Senior Citizens): उम्र के साथ धमनियां वैसे ही सख्त हो जाती हैं, ठंड इसे और बदतर बना देती है। डायबिटिक मरीज: डायबिटीज धमनियों की दीवारों को नुकसान पहुंचाती है। हाई शुगर और हाई बीपी का कॉम्बिनेशन जानलेवा हो सकता है। प्री-हाइपरटेंसिव लोग: जिनका बीपी बॉर्डरलाइन पर रहता है, ठंड में उनका बीपी बीमारी के स्तर तक पहुंच जाता है। मोटापे के शिकार: अधिक वजन वाले लोगों के दिल पर पहले से ही लोड ज्यादा होता है। बीपी को काबू में रखने का 'विंटर एक्शन प्लान' दवाइयां अपनी जगह हैं, लेकिन लाइफस्टाइल में बदलाव के बिना बीपी कंट्रोल करना नामुमकिन है। यहां जानिए सर्दियों में स्वस्थ रहने के 8 सुनहरे नियम: 1. धूप सेंकें और एक्टिव रहें अगर बाहर बहुत ठंड है, तो सुबह की वॉक धूप निकलने के बाद करें। अगर बाहर जाना संभव नहीं है, तो घर के अंदर ही योग, स्ट्रेचिंग या 'स्पॉट जॉगिंग' करें। रोजाना कम से कम 30 मिनट की एक्टिविटी जरूरी है। दोपहर में 15-20 मिनट धूप में बैठें, इससे नसें रिलैक्स होती हैं। 2. डाइट में पोटैशियम बढ़ाएं (Potassium Rich Diet) नमक (सोडियम) बीपी बढ़ाता है, जबकि पोटैशियम उसे कम करता है। पोटैशियम शरीर से एक्स्ट्रा सोडियम को पेशाब के जरिए बाहर निकाल देता है। क्या खाएं: केला, पालक, शकरकंद, संतरा, और नारियल पानी। ये सभी पोटैशियम के बेहतरीन स्रोत हैं। 3. पानी का नियम बनाएं प्यास लगे या न लगे, दिन भर में कम से कम 8-10 गिलास पानी जरूर पिएं। अगर ठंडा पानी नहीं पिया जा रहा, तो गुनगुना पानी पिएं। गुनगुना पानी नसों को खोलने (Vasodilation) में मदद करता है और ब्लड सर्कुलेशन सुधारता है। 4. नमक पर लगाम (Low Sodium) विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, पूरे दिन में 5 ग्राम (लगभग एक छोटा चम्मच) से कम नमक खाना चाहिए। अचार, पापड़, और पैकेट बंद नमकीन से पूरी तरह परहेज करें। खाने में ऊपर से नमक छिड़कना जहर समान है। 5. लेयरिंग करें (Dress Warmly) ठंड से बचने के लिए एक भारी जैकेट पहनने के बजाय, कपड़ों की कई परतें (Layering) पहनें। यह शरीर की गर्मी को बेहतर तरीके से ट्रैप करता है। सिर और कान को ढककर रखें क्योंकि शरीर की काफी गर्मी सिर से निकलती है। 6. कैफीन और शराब सीमित करें सर्दियों में चाय-कॉफी का दौर चलता रहता है। लेकिन ज्यादा कैफीन और अल्कोहल ब्लड प्रेशर को तुरंत बढ़ा देते हैं। अल्कोहल शरीर की गर्मी को भी तेजी से खत्म करता है, जो बाद में खतरनाक हो सकता है। 7. बीपी की मॉनिटरिंग (Home Monitoring) सर्दियों में अपना बीपी मशीन घर पर रखें। हफ्ते में 2-3 बार बीपी चेक करें। अगर बीपी लगातार 140/90 से ऊपर जा रहा है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। डॉक्टर सर्दियों के लिए आपकी दवा की डोज बदल सकते हैं। 8. तनाव और नींद (Stress & Sleep) सर्दियों के छोटे दिन और कम धूप कई बार 'विंटर ब्लूज' या डिप्रेशन का कारण बनते हैं। तनाव सीधे बीपी बढ़ाता है। 7-8 घंटे की गहरी नींद लें और मेडिटेशन करें। थोड़ी सी सावधानी, लंबी जिंदगी सर्दियां आनंद लेने का मौसम है, अस्पताल के चक्कर काटने का नहीं। हमारा शरीर मौसम के हिसाब से खुद को ढालता है, बस हमें उसका थोड़ा साथ देने की जरूरत है। रजाई का मोह त्यागें, थोड़ा पैदल चलें, पानी पिएं और नमक कम खाएं। याद रखें, आपका दिल आपके शरीर का इंजन है, अगर सर्दियों में इस इंजन पर लोड बढ़ा, तो पूरी गाड़ी ठप हो सकती है। अपने घर के बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें और कोई भी असहज लक्षण दिखने पर लापरवाही न बरतें। अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य जागरूकता और घरेलू नुस्खों पर आधारित है। यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है। अधिक जानकारी या किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए हमेशा अपने डॉक्टर या विशेषज्ञ से परामर्श करें। 'खबरीलाल न्यूज़' किसी भी नुस्खे की जिम्मेदारी का दावा नहीं करता है।
सर्दियों के मौसम में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम तेजी से बढ़ जाते हैं। जिस तरह हार्ट अटैक (Heart Attack) के मामलों में वृद्धि होती है, उसी तरह ब्रेन स्ट्रोक (Brain Stroke) के मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि जो लोग शराब (Alcohol) का सेवन और धूम्रपान (Smoking) करते हैं, उन्हें सर्दियों में खास तौर पर सावधान रहने की जरूरत है। चौंकाने वाली बात यह है कि अब कम उम्र के लोग भी ब्रेन स्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं, जिसकी सबसे बड़ी वजह नशाखोरी है।READ ALSO:-दिल्ली ब्लास्ट: 'तीन कार बम' धमाके की थी साजिश! फरीदाबाद से उमर का रिश्तेदार फहीम गिरफ्तार, तीसरी कार 'ब्रेजा' भी बरामद महिलाओं और पुरुषों में घटता अंतर चिकित्सकों के अनुसार, ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में पुरुषों और महिलाओं के बीच अब अधिक अंतर नहीं रह गया है। लिंग अनुपात: लखनऊ के राम मनोहर लोहिया संस्थान के न्यूरोसर्जन डॉ. कुलदीप का कहना है कि लगभग 5 साल पहले ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में पुरुषों की संख्या अधिक होती थी, लेकिन अब महिलाओं की संख्या पुरुषों के लगभग बराबर पहुँच रही है। कारण: डॉ. कुलदीप के अनुसार, आज के समय में महिला हो या पुरुष, हर कोई नशे का सेवन कर रहा है, जिसके चलते दोनों वर्गों से मरीज आ रहे हैं। 15 दिनों में 53 मरीज, युवा वर्ग भी प्रभावित डॉ. कुलदीप ने बताया कि सर्दियों में रक्त का संचार उचित तरीके से नहीं हो पाता, जिससे ब्रेन स्ट्रोक के केस अधिक सामने आते हैं। केस की संख्या: राम मनोहर लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में पिछले 15 दिनों में अब तक ब्रेन स्ट्रोक के 53 मरीज आ चुके हैं, जिसमें महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं। कम उम्र के शिकार: उन्होंने बताया कि संस्थान में युवा वर्ग के लोग भी काफी आ रहे हैं, जिन्हें ब्रेन स्ट्रोक पड़ रहा है। बड़ी वजह: इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि युवा वर्ग किसी न किसी तरीके का कोई न कोई नशा (अल्कोहल और स्मोकिंग) जरूर करते हैं, जो एक लंबे समय तक शरीर में बदलाव पैदा करता है। क्यों पड़ता है ब्रेन स्ट्रोक? डॉ. कुलदीप ने ब्रेन स्ट्रोक के वैज्ञानिक कारणों को समझाया। यह तब होता है, जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह बाधित होता है, जिससे मस्तिष्क के ऊतकों (Tissues) को ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं। इस्केमिक स्ट्रोक: इसमें रक्त वाहिका में थक्का जम जाता है और रक्त प्रवाह को रोक देता है। रक्तस्रावी स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क में कोई रक्त वाहिका फट जाती है और रक्तस्राव होता है। मुख्य जोखिम: इन ब्लॉकेज या रक्तस्राव के मुख्य कारण हैं: उच्च रक्तचाप, धूम्रपान, मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोग। स्वस्थ रहने के लिए क्या करें? केजीएमयू के न्यूरोसर्जन डॉ. रवि उनियाल ने Brain Stroke समेत अन्य गंभीर बीमारियों से बचने के लिए नियमित जांच और जीवनशैली में सुधार पर जोर दिया। जरूरी जाँचें: उन्होंने कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर व ब्लड प्रेशर की जांच नियमित रूप से कराने की सलाह दी, ताकि बीमारी का शुरुआती चरण में ही पता चल सके। जीवनशैली में सुधार: डॉ. रवि उनियाल ने कहा कि आज के समय में नशा (धूम्रपान और अल्कोहल) नियंत्रित करने और जीवनशैली को बेहतर करने की सबसे ज्यादा जरूरत है। समय पर अस्पताल: उन्होंने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक के मरीज अक्सर इमरजेंसी में आते हैं, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच कराना सबसे जरूरी है।
हाल के वर्षों में कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस बात का दावा किया है कि किसी व्यक्ति का ब्लड ग्रुप (Blood Group) दिल की बीमारियों के खतरे को प्रभावित कर सकता है। सामान्यतः चार मुख्य ब्लड ग्रुप होते हैं – A, B, AB और O। आपका ब्लड ग्रुप ABO जीन पर निर्भर करता है, जो हमें माता-पिता से विरासत में मिलता है। कई स्टडीज से पता चला है कि O ब्लड ग्रुप की तुलना में कुछ अन्य ब्लड ग्रुप्स में हार्ट अटैक (Heart Attack) का जोखिम अधिक होता है। किस ब्लड ग्रुप को हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा है? साल 2012, 2017 और 2020 में हुई अलग-अलग स्टडीज के आंकड़ों के अनुसार, हार्ट अटैक का खतरा नॉन-ओ ब्लड ग्रुप (Non-O Blood Groups) वाले लोगों में अधिक देखा गया है: स्टडी का वर्ष तुलनात्मक ब्लड ग्रुप हार्ट अटैक का खतरा जनवरी 2020 टाइप A और B की तुलना में टाइप O A में 8% और B में 10% ज्यादा साल 2017 O ब्लड ग्रुप के अलावा बाकी सभी 9% ज्यादा साल 2012 O ब्लड ग्रुप की तुलना में AB में 23%, B में 11% और A में 5% ज्यादा इन स्टडीज के आंकड़ों का सार यह है कि जिन लोगों का ब्लड टाइप A, B, या AB है, उनमें O ब्लड ग्रुप वाले लोगों की तुलना में हार्ट अटैक का खतरा अधिक होता है। इनमें भी, टाइप AB और B को सबसे ज्यादा जोखिम वाला माना गया है। इन ब्लड ग्रुप्स में हार्ट अटैक का खतरा ज्यादा क्यों है? शोधकर्ताओं ने नॉन-ओ ब्लड ग्रुप्स (A, B, AB) में हार्ट अटैक का खतरा अधिक होने के पीछे दो प्रमुख कारण पाए हैं: खून के थक्के बनने का खतरा: नॉन-ओ ब्लड ग्रुप्स में वॉन विलेब्रैंड फैक्टर (Von Willebrand Factor) और फैक्टर VIII जैसे खून के थक्के बनने से जुड़े कारक (Clotting Factors) O ब्लड ग्रुप वाले लोगों की तुलना में अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। ये थक्के धमनियों में जमा होकर उन्हें ब्लॉक कर सकते हैं, जिससे Heart Attack Risk बढ़ जाता है। सूजन (इंफ्लेमेशन): इन ब्लड ग्रुप्स में इंफ्लेमेशन मार्कर (सूजन का खतरा) भी ज्यादा होता है, जो धमनियों की दीवारों को नुकसान पहुँचा सकता है और दिल की बीमारियों को बढ़ा सकता है। सबसे बड़ा जोखिम ब्लड ग्रुप नहीं, जीवनशैली है चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, किसी व्यक्ति का ब्लड ग्रुप केवल एक आनुवंशिक जोखिम कारक (Genetic Risk Factor) है। हार्ट अटैक का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कारण ब्लड ग्रुप नहीं, बल्कि आपकी लाइफस्टाइल और रोजमर्रा की आदतें होती हैं। नियंत्रण योग्य कारक: हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, अत्यधिक शराब का सेवन, धूम्रपान, उच्च रक्तचाप (Blood Pressure) और खराब खान-पान जैसी समस्याएं दिल की दिक्कतों (Heart Problems) की वजह बनती हैं। सलाह: ब्लड ग्रुप चाहे कोई भी हो, स्वस्थ जीवनशैली, संतुलित डाइट और नियमित व्यायाम करके हार्ट अटैक के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। लाइफस्टाइल पर ध्यान देना सबसे जरूरी यह जानना जरूरी है कि ब्लड ग्रुप हार्ट अटैक के कई जोखिम कारकों में से सिर्फ एक है। ब्लड ग्रुप से कहीं ज्यादा आपकी लाइफस्टाइल, खानपान और रोजमर्रा की आदतें दिल की बीमारियों (Heart Problems) की वजह बनती हैं। इसलिए, आपका ब्लड ग्रुप कोई भी हो, अपनी जीवनशैली और डाइट का खास ख्याल रखें। हाई कॉलेस्ट्रोल, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और स्मोकिंग जैसी आदतें हार्ट अटैक के सबसे बड़े रिस्क फैक्टर्स में शामिल हैं। इनसे बचकर रहना ही दिल को सुरक्षित रखने का सबसे अच्छा तरीका है। अस्वीकरण: इस खबर को सामान्य जानकारी के तौर पर लिखा गया है। यह किसी भी तरह से डॉक्टरी सलाह का विकल्प नहीं है। अधिक जानकारी के लिए विशेषज्ञ की सलाह लें या चिकित्सक से परामर्श करें। खबरीलाल मीडिया इस जानकारी की सटीकता का कोई दावा नहीं करता है।
हमारी आधुनिक जीवनशैली ने हमें कई सुविधाएं दी हैं, लेकिन साथ ही एक ऐसा खतरा भी दिया है जिस पर हम अक्सर ध्यान नहीं देते - हमारी कुर्सी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की दुनिया में एक कहावत तेजी से हकीकत बनती जा रही है: 'सिटिंग इज द न्यू स्मोकिंग' यानी 'लंबे समय तक बैठना, धूम्रपान करने जितना ही खतरनाक है'। यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक तथ्य है जो बताता है कि आपकी 8-9 घंटे की डेस्क जॉब धीरे-धीरे आपके शरीर को अंदर से खोखला कर रही है।READ ALSO:-महंगाई का एक और झटका! आधार कार्ड में कुछ भी बदलवाना अब हुआ महंगा, 1अक्टूबर 2025 से लागू हुईं नई दरें लगातार एक ही जगह पर बैठे रहना हमारे शरीर के लिए अप्राकृतिक है। हमारा शरीर चलने-फिरने और सक्रिय रहने के लिए बना है। जब हम घंटों तक खुद को एक कुर्सी तक सीमित कर लेते हैं, तो हमारे शरीर का पूरा सिस्टम गड़बड़ा जाता है। क्यों है बैठना इतना खतरनाक? समझिए विज्ञान जैसे ही आप बैठते हैं, आपके शरीर में कई नकारात्मक बदलाव शुरू हो जाते हैं: कैलोरी बर्निंग ठप: चलते समय आप प्रति मिनट जितनी कैलोरी बर्न करते हैं, बैठने पर वह घटकर सिर्फ एक तिहाई रह जाती है। मेटाबॉलिज्म सुस्त: लंबे समय तक बैठने से शरीर का मेटाबॉलिज्म 90% तक धीमा हो सकता है, जिससे फैट बर्न करने वाले एंजाइम का उत्पादन बंद हो जाता है। यही वजह है कि बैठे रहने वालों का पेट और कमर के आसपास फैट तेजी से जमा होता है। ब्लड शुगर का खतरा: बैठने के महज एक घंटे बाद ही शरीर की इंसुलिन को इस्तेमाल करने की क्षमता घटने लगती है, जिससे टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। दिल पर सीधा असर: बैठने से रक्त प्रवाह धीमा हो जाता है, जिससे खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) धमनियों में जमा होने लगता है। यह हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का सीधा कारण बनता है। हड्डियां और मांसपेशियां कमजोर: लगातार बैठे रहने से पीठ, गर्दन और कूल्हे की मांसपेशियां निष्क्रिय और कमजोर हो जाती हैं, जिससे खराब पोस्चर, स्लिप डिस्क और कमर दर्द जैसी समस्याएं जन्म लेती हैं। सिर्फ एक आदत बदल सकती है जिंदगी: '30-मिनट का नियम' आपको अपनी नौकरी छोड़ने की जरूरत नहीं है, बस काम करने का तरीका बदलना है। एक्सपर्ट्स इसके लिए एक गोल्डन रूल बताते हैं - "हर 30 मिनट में उठें और 2-3 मिनट चलें।" यह छोटा सा ब्रेक आपके शरीर को रीसेट कर देता है। रक्त प्रवाह फिर से सुचारू हो जाता है, मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और मेटाबॉलिज्म फिर से काम करने लगता है। आज से ही अपनाएं ये जीवनरक्षक आदतें: अलार्म सेट करें: अपने फोन या कंप्यूटर पर हर 30 मिनट का अलार्म लगाएं। जैसे ही अलार्म बजे, अपनी कुर्सी से उठ जाएं। चलते-फिरते रहें: फोन पर बात करते समय या मीटिंग के दौरान जब संभव हो, खड़े होकर या टहलते हुए बात करें। लिफ्ट को कहें 'ना': ऑफिस में लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करें। यह आपके दिल के लिए एक बेहतरीन एक्सरसाइज है। हाइड्रेशन ब्रेक: पानी पीने के लिए अपनी बोतल डेस्क पर रखने के बजाय वॉटर कूलर तक चलकर जाएं। इससे आप हाइड्रेटेड भी रहेंगे और ब्रेक भी हो जाएगा。 डेस्क एक्सरसाइज: बैठे-बैठे भी गर्दन घुमाएं, कंधों को स्ट्रेच करें और पैरों को सीधा करें। लंच ब्रेक में टहलें: अपना लंच अपनी डेस्क पर करने के बजाय, कैफेटेरिया तक जाएं और खाने के बाद 5-10 मिनट टहलें। याद रखिए, धूम्रपान की तरह ही, लंबे समय तक बैठने का असर तुरंत नहीं दिखता। यह धीरे-धीरे आपके शरीर को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए, इससे पहले कि आपकी कुर्सी आपकी सेहत पर भारी पड़े, आज ही ये छोटे लेकिन प्रभावी कदम उठाएं और एक स्वस्थ जीवन की ओर बढ़ें।
केरल: केरल में 'ब्रेन-ईटिंग अमीबा' (Naegleria fowleri) के बढ़ते मामले चिंता का विषय बन गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जहाँ दुनियाभर में इस दुर्लभ संक्रमण के 500 से भी कम मामले सामने आए हैं, वहीं अकेले केरल में 120 से ज़्यादा केस दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 19 लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीमारी का कोई सटीक इलाज या वैक्सीन नहीं होने के कारण यह बेहद जानलेवा साबित होती है।READ ALSO:-Amazon-Flipkart सेल में ऐसे मिलेगा एक्स्ट्रा डिस्काउंट, जानिए 3 शानदार तरीके क्या है ब्रेन-ईटिंग अमीबा? सफदरजंग अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. जुगल किशोर के अनुसार, यह अमीबा गंदे और गर्म मीठे पानी में पनपता है। यह पीने के पानी से शरीर में प्रवेश नहीं करता, बल्कि नाक के रास्ते से दिमाग तक पहुँचता है। जब कोई व्यक्ति प्रदूषित तालाब, झील या स्विमिंग पूल में नहाता या तैरता है और पानी नाक के अंदर चला जाता है, तो यह अमीबा सीधे मस्तिष्क में पहुँचकर संक्रमण फैलाता है, जिसे प्राइमरी अमीबिक मेनिंजोएन्सेफलाइटिस (PAM) कहा जाता है। डॉ. किशोर बताते हैं कि इस संक्रमण के शुरुआती लक्षण सामान्य फ्लू जैसे होते हैं, जैसे सिरदर्द, बुखार और थकान। लेकिन, यह तेजी से बढ़ता है और बाद में मरीज को भ्रम, दौरे और कोमा जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसकी मृत्यु दर 95% से भी अधिक है। केरल में क्यों बढ़ रहा है खतरा? दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में मेडिसिन विभाग के डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सुभाष गिरि के मुताबिक, केरल में इस अमीबा के अधिक मामले सामने आने की कुछ खास वजहें हो सकती हैं: गर्म और आर्द्र जलवायु: केरल की जलवायु इस अमीबा के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है। प्रदूषित जलाशय: लगातार बारिश के बाद बनने वाले तालाब और झीलों का लोग रोजमर्रा के कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। खराब रखरखाव: शहरी इलाकों में स्विमिंग पूल्स की सही साफ-सफाई न होने से भी यह संक्रमण फैल सकता है। कैसे करें बचाव? इस खतरनाक बीमारी से बचाव ही एकमात्र उपाय है। इन तरीकों को अपनाकर आप खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं: साफ पानी का उपयोग: पीने और नहाने के लिए हमेशा स्वच्छ या उबले हुए पानी का ही इस्तेमाल करें। सावधानी बरतें: खुले जलाशयों जैसे तालाबों और झीलों में नहाते समय यह सुनिश्चित करें कि पानी आपकी नाक में न जाए। पूल की सफाई: स्विमिंग पूल्स को नियमित रूप से क्लोरीन और अन्य रसायनों से साफ करवाएं। लक्षणों पर ध्यान दें: अगर आपको सिरदर्द, बुखार, उल्टी या गर्दन में अकड़न जैसे लक्षण दिखें तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
हमारे शरीर में खून का सही संतुलन बनाए रखना बेहद ज़रूरी है, और इसमें प्लेटलेट्स की अहम भूमिका होती है। चोट लगने पर खून का बहाव रोकने से लेकर घाव भरने तक, ये छोटे-छोटे सेल्स कई बड़े काम करते हैं। आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति के खून में इनका स्तर 1.5 लाख से 4.5 लाख प्रति माइक्रो लीटर के बीच होता है। लेकिन, कुछ लोगों में यह स्तर हमेशा 1 लाख से 1.5 लाख के बीच ही रहता है। ऐसे में कई बार लोग घबरा जाते हैं। इस विषय पर मीडिया से बातचीत में मैक्स अस्पताल में हेमेटोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. रोहित कपूर और आरएमएल हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग के डॉ. सुभाष गिरि से बात की।READ ALSO:-बेंगलुरु में ट्रैफिक जाम से जंग जीतकर मेट्रो से दौड़ा 'जीवन': डॉक्टरों ने हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए अपनाया अनूठा तरीका प्लेटलेट्स क्या होते हैं और इनका काम क्या है? प्लेटलेट्स शरीर की बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में बनने वाले छोटे-छोटे सेल्स होते हैं। इनका मुख्य काम खून का थक्का बनाना होता है। जब भी शरीर में कोई चोट लगती है, तो प्लेटलेट्स एक साथ मिलकर खून के बहाव को रोकते हैं। इनका काम इतना महत्वपूर्ण है कि इनकी संख्या अगर तय मानक से बहुत कम (20 से 30 हजार से भी कम) हो जाए तो व्यक्ति की जान को खतरा हो सकता है। शरीर में प्लेटलेट्स क्यों कम हो जाती हैं? डॉ. रोहित कपूर बताते हैं कि प्लेटलेट्स के कम होने के कई कारण हो सकते हैं: बोन मैरो की बीमारियां: अप्लास्टिक एनीमिया, ल्यूकेमिया और मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम जैसी स्थितियां बोन मैरो को नुकसान पहुंचा सकती हैं। विटामिन की कमी: फोलेट और विटामिन B12 जैसे विटामिन की कमी भी प्लेटलेट्स के निर्माण पर असर डाल सकती है। संक्रमण: हेपेटाइटिस C और HIV जैसे कुछ वायरल संक्रमण भी बोन मैरो के काम को सीधे प्रभावित करते हैं। डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां भी प्लेटलेट्स को तेजी से कम कर सकती हैं। प्लेटलेट्स का लेवल: कम होने पर क्या करें? डॉ. रोहित के अनुसार, प्लेटलेट्स के लेवल के आधार पर ही इलाज किया जाता है: हल्की कमी (1,01,000 - 1,50,000): इस स्थिति में आमतौर पर इलाज की जरूरत नहीं होती। अगर यह स्तर हमेशा बना रहता है तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन हर तीन महीने में जांच कराना उचित होता है। गंभीर स्थिति (50,000 से कम): यह एक गंभीर स्थिति है और तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता होती है। अगर काउंट 10,000 से कम हो जाए तो यह जानलेवा हो सकता है और ब्लीडिंग का खतरा रहता है। क्यों कुछ लोगों में 1 से 1.5 लाख का लेवल ही रहता है? डॉ. रोहित बताते हैं कि कुछ लोगों में जन्म से ही प्लेटलेट्स की संख्या एक से डेढ़ लाख के बीच हो सकती है। मेडिकल भाषा में इसे 'Constitutional Thrombocytopenia' कहा जाता है। ऐसे लोगों में यह काउंट सालों तक स्थिर रहता है और यह किसी बीमारी का संकेत नहीं होता है। हालांकि, अगर किसी का प्लेटलेट्स लेवल 1 लाख से नीचे चला जाए और इसके साथ ही हीमोग्लोबिन और टीएलसी भी कम हो तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है, जिसके लिए तुरंत जांच करानी चाहिए। कब कराएं प्लेटलेट्स की जांच और कौन सा टेस्ट है जरूरी? डॉ. सुभाष गिरि बताते हैं कि प्लेटलेट्स कम होना हमेशा डरने की बात नहीं है, लेकिन इसे हल्के में भी नहीं लेना चाहिए। सही समय पर टेस्ट और डॉक्टर की सलाह से स्थिति संभाली जा सकती है। सबसे आम टेस्ट: शरीर में प्लेटलेट्स काउंट की जांच के लिए सबसे आम टेस्ट CBC (Complete Blood Count) है। अगर शरीर में हमेशा थकावट या कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होते हैं तो यह टेस्ट करा लेना चाहिए। यह एक बेसिक और सस्ता टेस्ट है जो स्वास्थ्य की कई जानकारी दे देता है। बोन मैरो टेस्ट की जरूरत: यह जांच आमतौर पर तब की जाती है जब प्लेटलेट्स की संख्या 50,000 से भी कम हो जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं ब्लड कैंसर तो नहीं है। हालांकि, कम काउंट होने का मतलब यह कतई नहीं है कि कैंसर ही हो। क्या घरेलू नुस्खों से बढ़ जाते हैं प्लेटलेट्स? डॉ. सुभाष इस पर कहते हैं कि न तो बकरी का दूध और न ही पपीते के पत्तों से प्लेटलेट्स बढ़ने का मेडिकल साइंस में कोई प्रमाण है। ऐसे में इन पर भरोसा न करें। यदि प्लेटलेट्स का स्तर 1 लाख से नीचे है तो डॉक्टर से सलाह लें और सही इलाज कराएं। सही समय पर टेस्ट और ट्रीटमेंट से बीमारी को काबू में किया जा सकता है।
दुनियाभर में 'फैटी लिवर' की बीमारी तेजी से फैल रही है, और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसकी चपेट में सबसे ज्यादा युवा आ रहे हैं। यह एक गंभीर स्थिति है, क्योंकि यह सीधे तौर पर हमारी बिगड़ती जीवनशैली से जुड़ी है। हाल ही के आंकड़ों से पता चला है कि भारत में, खासकर डेस्क जॉब करने वाले या आईटी प्रोफेशनल्स में यह बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ रही है। इंडियन मेडिकल काउंसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 84% कर्मचारियों में फैटी लिवर पाया गया है। क्या है फैटी लिवर और क्यों बढ़ रहे हैं इसके मामले? फैटी लिवर लिवर से संबंधित एक बीमारी है, जिसमें लिवर में बहुत ज्यादा मात्रा में वसा (फैट) जमा हो जाता है। इसके दो मुख्य प्रकार होते हैं: एल्कोहॉलिक फैटी लिवर (AFLD): यह शराब के अधिक सेवन से होता है। नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर (NAFLD): यह उन लोगों में होता है जो शराब नहीं पीते हैं। पहले AFLD के मामले ज्यादा होते थे, लेकिन अब NAFLD के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसका सबसे बड़ा कारण हमारी सेडेंटरी लाइफस्टाइल है, जहां लोग घंटों तक बैठे रहते हैं और शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं होते। मोटापा और गलत खान-पान है सबसे बड़ा कारण सर गंगा राम अस्पताल के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट बताते हैं कि नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर का सबसे बड़ा कारण मोटापा है, जो गलत खान-पान और शारीरिक गतिविधि की कमी से होता है। डेस्क जॉब और फास्ट फूड: आईटी प्रोफेशनल्स और डेस्क जॉब करने वाले लोग पूरे दिन कुर्सी पर बैठे रहते हैं। इसके अलावा, वे अक्सर फास्ट फूड का सेवन करते हैं, जिससे शरीर में कैलोरी और फैट की मात्रा बढ़ती है। अन्य कारण: इसके अलावा, मीठे पेय पदार्थों का अधिक सेवन, समय पर न सोना, नींद पूरी न करना, हार्मोनल असंतुलन और तनाव भी फैटी लिवर के प्रमुख कारण हैं। तनाव से अक्सर लोग ओवरईटिंग करने लगते हैं, जिससे वजन बढ़ता है। कैसे पहचानें फैटी लिवर के शुरुआती संकेत? फैटी लिवर को अक्सर 'साइलेंट किलर' कहा जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। हालांकि, इन संकेतों को समय पर पहचानना जरूरी है: लगातार थकान और कमजोरी महसूस करना। पेट के ऊपरी हिस्से में हल्का दर्द या भारीपन होना। पेट में सूजन। वजन का तेजी से बढ़ना। त्वचा और आंखों का पीला पड़ना (पीलिया)। समय रहते इस बीमारी को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है, क्योंकि अगर इसका इलाज न हो तो यह आगे चलकर लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। अपनी जीवनशैली में बदलाव कर इस बीमारी से बचा जा सकता है।
पश्चिम बंगाल के लोकप्रिय डिजिटल क्रिएटर सोफिक एसके (Sofik SK) और उनकी कथित गर्लफ्रेंड सोनाली (Sonali), जो 'दूस्तु सोनाली' नाम से भी जानी जाती हैं, एक बड़े और गंभीर विवाद में घिर गए हैं। सोशल मीडिया पर कथित तौर पर उनका एक 15 मिनट से अधिक का निजी वीडियो (MMS) लीक हो गया है, जिसने इंटरनेट पर हंगामा मचा दिया है।READ ALSO:-वो एक फिल्म जिसने धर्मेंद्र को बनाया बॉलीवुड का 'ही-मैन', 1966 में रातों-रात बदल गई थी किस्मत; शर्ट उतारते ही मच गया था तहलका हमारे Telegram चैनल से जुड़ें अभी Join करें वीडियो के वायरल होने के बाद, सोफिक और उनकी गर्लफ्रेंड सोनाली ने चुप्पी तोड़ते हुए एक सार्वजनिक बयान जारी किया है। उन्होंने दावा किया है कि यह वीडियो उनकी सहमति के बिना सर्कुलेट किया गया है और यह चोरी और ब्लैकमेलिंग का मामला है। कपल ने तोड़ी चुप्पी: आत्महत्या के विचार और ब्लैकमेलिंग का आरोप सोशल मीडिया पर गंभीर आलोचना और ट्रोलिंग का सामना करने के बाद, सोफिक और सोनाली ने इस विवाद पर अपना पक्ष रखा। दोनों ने साफ किया कि यह वीडियो निजी इस्तेमाल के लिए था और इसे उनकी अनुमति के बिना लीक किया गया है। सोनाली का बयान: सोनाली ने एक वीडियो जारी कर बेहद भावुक होते हुए कहा कि वीडियो लीक होने के बाद उन्हें लगातार आत्महत्या करने के विचार आ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके इस वीडियो को किसी करीबी व्यक्ति ने चुराया और लीक किया है। ब्लैकमेलिंग का आरोप: सोनाली ने स्पष्ट रूप से 'रूबल' नामक एक व्यक्ति का नाम लिया और आरोप लगाया कि वही उन्हें वीडियो को लेकर ब्लैकमेल कर रहा था। जब कपल ने उस व्यक्ति के साथ काम करना बंद कर दिया, तो उसने बदला लेने के लिए वीडियो लीक कर दिया। सोफिक का माफीनामा: सोफिक एसके ने भी अपने फॉलोअर्स से माफी मांगते हुए एक वीडियो जारी किया। उन्होंने कहा कि यह लीक हुआ वीडियो एक साल से अधिक पुराना है और अब वह एक बदले हुए इंसान हैं, जो सिर्फ अपने काम पर ध्यान दे रहे हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ दोस्त उनकी तरक्की से जलते हैं और इसी वजह से उन्होंने यह वीडियो पोस्ट किया। प्राइवेसी उल्लंघन और डीपफेक की बहस लगभग 15 मिनट लंबा यह कथित वीडियो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 'सोफिक वायरल वीडियो' के नाम से ट्रेंड कर रहा है। निजता का उल्लंघन: यह मामला एक बार फिर डिजिटल सुरक्षा और निजता के उल्लंघन (Privacy Breach) के गंभीर खतरों को सामने लाया है। ऑथेंटिसिटी पर संदेह: हालांकि कपल ने वीडियो के उनके होने की पुष्टि की है, लेकिन कई ऑनलाइन यूजर्स अभी भी यह बहस कर रहे हैं कि क्या यह वीडियो पूरी तरह से असली है या इसमें एआई आधारित 'डीपफेक' तकनीक का उपयोग किया गया है। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब कई अन्य सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी कथित MMS स्कैंडल्स का सामना कर चुके हैं। सोफिक एसके कौन हैं? सोफिक एसके, जो पल्ली ग्राम टीवी (Palli Gram TV) नामक एक लोकप्रिय चैनल के मुख्य अभिनेता और डिजिटल क्रिएटर हैं, पश्चिम बंगाल में काफी प्रसिद्ध हैं। वह अपनी कॉमेडी, लोक थिएटर शैली और बंगाली ड्रामा वीडियो के लिए जाने जाते हैं। इस गंभीर विवाद के बाद, सोशल मीडिया पर रूबल नामक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग तेज हो गई है, जिसने कथित तौर पर ब्लैकमेलिंग के बाद इस निजी वीडियो को सार्वजनिक किया। बंगाली इन्फ्लुएंसर सोफिक एसके और उनकी गर्लफ्रेंड सोनाली का कथित MMS लीक होना एक गंभीर साइबर अपराध का मामला है। कपल के ब्लैकमेलिंग और चोरी के आरोपों ने इस घटना को एक निजी विवाद से बदलकर डिजिटल युग में प्राइवेसी और सुरक्षा के एक बड़े सवाल में बदल दिया है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अब जल्द से जल्द हस्तक्षेप करना होगा ताकि वीडियो को आगे फैलने से रोका जा सके और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। /* CSS Styling for the Telegram Banner */ .telegram-banner { display: flex; align-items: center; justify-content: center; padding: 15px 20px; margin: 20px auto; /* Centering the banner */ max-width: 800px; /* Optional: Sets a max width */ background-color: #229ED9; /* Telegram Blue */ border-radius: 10px; box-shadow: 0 4px 15px rgba(0, 0, 0, 0.2); font-family: Arial, sans-serif; } .telegram-banner-content { display: flex; align-items: center; gap: 15px; /* Space between text and button/icon */ flex-wrap: wrap; /* Allows items to wrap on smaller screens */ justify-content: center; } .telegram-icon { font-size: 30px; color: white; /* You can replace this with an actual Telegram logo image or a font icon like Font Awesome */ } .telegram-text { color: white; font-size: 18px; font-weight: bold; line-height: 1.4; text-align: center; } .telegram-join-button { background-color: #f7f7f7; /* Light background for contrast */ color: #229ED9; /* Telegram Blue text */ border: none; padding: 10px 20px; border-radius: 5px; text-decoration: none; /* Removes underline from link */ font-weight: bold; font-size: 16px; transition: background-color 0.3s ease; text-align: center; } .telegram-join-button:hover { background-color: #e0e0e0; } /* For responsiveness on very small screens */ @media (max-width: 600px) { .telegram-banner { padding: 15px; } .telegram-text { font-size: 16px; } }
आगरा/मेरठ (Agra/Meerut News): उत्तर प्रदेश के आगरा में सर्दी की शुरुआत के साथ ही एक बेहद दर्दनाक हादसा सामने आया है। यहां मलपुरा थाने में तैनात 29 वर्षीय सिपाही निखिल मोतला (Constable Nikhil Motla) की बाथरूम में नहाते समय संदिग्ध परिस्थितियों में करंट लगने से मौत हो गई। बताया जा रहा है कि पानी गर्म करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इमर्शन रॉड (Immersion Rod) से बाल्टी के पानी में करंट उतर आया, जिसकी चपेट में आने से सिपाही की जान चली गई।READ ALSO:-मेरठ में 'रक्तचरित्र': मां के सामने बेटे के सीने में उतार दी गोलियां, वकील बनने से पहले ही छात्र को मिली मौत; जीजा ने लिया 'लव मैरिज' का खूनी बदला मूल रूप से मेरठ के दादरी सकौती के रहने वाले निखिल की मौत की खबर जैसे ही उनके पैतृक गांव पहुंची, वहां कोहराम मच गया। शुक्रवार सुबह जब उनका शव गांव पहुंचा तो सपा विधायक अतुल प्रधान सहित हजारों लोगों ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी। बंद कमरे में क्या हुआ उस वक्त? घटना आगरा के बमरौली रोड स्थित केसीआर कॉलोनी की है, जहां निखिल अपने बचपन के दोस्त और साथी सिपाही आशीष के साथ किराए के मकान में रहते थे। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, यह हादसा गुरुवार सुबह हुआ। निखिल को सुबह ड्यूटी पर जाना था। ठंड के कारण उन्होंने नहाने के लिए बाथरूम में बाल्टी में पानी गर्म करने के लिए इमर्शन रॉड लगाई थी। प्लग ऑन करने के बाद वे कुछ देर के लिए कमरे में आए और वर्दी तैयार करने लगे। कुछ देर बाद जब उन्हें लगा कि पानी गर्म हो गया होगा, तो वे नहाने के लिए बाथरूम में चले गए। दोस्त ने देखा खौफनाक मंजर निखिल के रूममेट और सिपाही आशीष ने बताया कि करीब 20 मिनट तक जब बाथरूम से पानी गिरने की आवाज नहीं आई और निखिल बाहर नहीं निकले, तो उन्हें शक हुआ। आशीष ने कई बार आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अनहोनी की आशंका में जब आशीष बाथरूम की तरफ गए, तो दरवाजा खुला था। अंदर का नजारा देखकर आशीष के होश उड़ गए। निखिल फर्श पर अचेत पड़े थे और उनका एक हाथ पानी की बाल्टी के अंदर ही था। बाल्टी में इमर्शन रॉड (Immersion Rod Accident) चालू हालत में थी। बचाने के प्रयास में दोस्त को भी लगा करंट आशीष ने बताया कि जैसे ही उन्होंने निखिल को उठाने की कोशिश की, उन्हें भी जोरदार बिजली का झटका लगा। समझदारी दिखाते हुए उन्होंने तुरंत स्विच बोर्ड से रॉड का प्लग बंद किया और तार को बाल्टी से बाहर खींचा। इसके बाद आनन-फानन में निखिल को ग्वालियर रोड स्थित नवभारत हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। 2021 बैच के सिपाही थे निखिल, 8 महीने की है बेटी निखिल मोतला 2021 बैच के आरक्षी थे और करीब 8 महीने पहले ही उनकी तैनाती आगरा के मलपुरा थाने में हुई थी। उनके पिता प्रदीप मोतला मेरठ के कद्दावर किसान नेता हैं और मंडौरा समिति के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है क्योंकि निखिल की शादी महज डेढ़ साल पहले ही हुई थी। उनकी 8 महीने की एक मासूम बेटी है, जिसके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया। निखिल मंगलवार को ही छुट्टी खत्म करके वापस ड्यूटी पर आगरा लौटे थे। पुलिस विभाग में शोक की लहर सिपाही की मौत की सूचना मिलते ही एसीपी डॉ. सुकन्या शर्मा और डीसीपी पश्चिमी जोन अतुल शर्मा अस्पताल और पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। अधिकारियों ने बताया कि आशीष और निखिल बचपन के दोस्त थे, साथ पढ़े और साथ ही पुलिस में भर्ती हुए थे। पोस्टमार्टम के बाद पुलिस लाइन में निखिल को श्रद्धांजलि दी गई और शव को सम्मान के साथ मेरठ भेजा गया। एक्सपर्ट की राय: इमर्शन रॉड इस्तेमाल करते समय बरतें सावधानी सर्दियों में इमर्शन रॉड से सिपाही की मौत (Agra Constable Electrocution) जैसी घटनाएं आम हो जाती हैं। बिजली एक्सपर्ट्स का कहना है कि इमर्शन रॉड एक सस्ता और पोर्टेबल वाटर हीटर है, लेकिन इसमें ऑटो-कट फीचर नहीं होता। पानी चेक न करें: रॉड चालू होने पर पानी में कभी उंगली डालकर तापमान चेक न करें। प्लास्टिक की बाल्टी: हो सके तो अच्छी क्वालिटी की प्लास्टिक बाल्टी का प्रयोग करें, लोहे की बाल्टी में करंट फैलने का खतरा 100% होता है। स्विच ऑफ करें: नहाने जाने से पहले प्लग को सॉकेट से पूरी तरह निकाल दें, केवल स्विच ऑफ करना काफी नहीं है। अर्थिंग: घर में अर्थिंग का सही होना बेहद जरूरी है। आगरा में हुए इस हादसे ने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया है। सिपाही निखिल मोतला की मौत हम सभी के लिए एक चेतावनी है कि बिजली के उपकरणों, खासकर इमर्शन रॉड का इस्तेमाल करते समय थोड़ी सी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।
देश की राजधानी दिल्ली को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जोड़ने वाली हाईस्पीड महत्वाकांक्षी परियोजना 'नमो भारत' (Namo Bharat) यानी रैपिड रेल एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इस बार वजह इसकी रफ़्तार, वर्ल्ड क्लास सुविधाएं या तकनीकी उत्कृष्टता नहीं है। इस बार वजह है एक ऐसा वीडियो जिसने न केवल सार्वजनिक मर्यादाओं को तार-तार किया है, बल्कि रेलवे के 'सुरक्षित सफर' के दावे पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। सोशल मीडिया पर पिछले 24 घंटों से एक वीडियो जंगल की आग की तरह वायरल हो रहा है। वीडियो नमो भारत ट्रेन के एक कोच के भीतर का है, जिसमें एक प्रेमी युगल (जो स्कूली ड्रेस में नजर आ रहा है) बेहद आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दे रहा है। हालांकि, मामला सिर्फ अश्लीलता का नहीं है। इस घटना ने एक बहुत बड़े खतरे की घंटी बजा दी है—और वह खतरा है 'डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा में सेंध' का। आखिर एक अति-सुरक्षित कंट्रोल रूम से सीसीटीवी फुटेज बाहर कैसे आया? क्या है वायरल वीडियो में? (The Viral Content) प्राप्त जानकारी के अनुसार, वायरल हो रहा वीडियो मेरठ से गाजियाबाद के बीच चलने वाली रैपिड रेल के किसी कोच का है। पात्र: वीडियो में दिख रहे युवक और युवती की उम्र कम लग रही है और दोनों ने स्कूल यूनिफॉर्म (School Dress) पहनी हुई है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि वे किसी स्कूल के छात्र हैं। घटनाक्रम: कोच में अन्य यात्रियों की संख्या न के बराबर थी। खाली सीटों और एकांत का फायदा उठाकर यह युगल मर्यादा की सभी सीमाएं लांघते हुए अश्लील हरकतें (Obscene Acts) करता नजर आया। कैमरा एंगल: वीडियो को देखकर साफ पता चलता है कि इसे किसी मोबाइल से रिकॉर्ड नहीं किया गया, बल्कि यह ऊपर लगे CCTV कैमरे की रिकॉर्डिंग है। वीडियो में टाइम स्टैम्प और कैमरा आईडी जैसी तकनीकी डीटेल्स भी देखी जा सकती हैं, जो पुष्टि करती हैं कि यह आधिकारिक फुटेज है। दिल्ली मेट्रो की राह पर नमो भारत? यह पहली बार नहीं है जब किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ऐसी घटना हुई हो। इससे पहले दिल्ली मेट्रो (Delhi Metro) भी ऐसे ही कारणों से बदनाम हो चुकी है। वहां भी आए दिन 'किसिंग वीडियो' और आपत्तिजनक हरकतें वायरल होती रहती हैं। लेकिन नमो भारत में हुई यह घटना इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि यह एक प्रीमियम और हाई-सिक्योरिटी ट्रांसपोर्ट सिस्टम है, जिसका संचालन और निगरानी बेहद सख्त मानी जाती है। सोशल मीडिया पर लोग अब तंज कस रहे हैं कि "क्या दिल्ली मेट्रो का वायरल वायरस अब नमो भारत तक पहुंच गया है?" असली मुद्दा: बेडरूम तक नहीं, कंट्रोल रूम तक है खतरा (The Real Scandal: CCTV Leak) इस पूरे मामले में स्कूली छात्रों की हरकत निंदनीय हो सकती है, लेकिन उससे भी बड़ा और गंभीर अपराध वह है जो NCRTC (National Capital Region Transport Corporation) के भीतर हुआ है। सवाल यह है कि CCTV फुटेज पब्लिक डोमेन में किसने डाला? रैपिड रेल में यात्रियों की सुरक्षा के लिए हाई-डेफिनिशन कैमरे लगाए गए हैं। इनका लाइव फीड और रिकॉर्डिंग केवल अधिकृत सुरक्षा कर्मियों और कंट्रोल रूम के अधिकारियों के पास होती है। यह डेटा बेहद संवेदनशील (Sensitive Data) माना जाता है। विश्वासघात (Breach of Trust): यात्री इस भरोसे के साथ सफर करते हैं कि कैमरे उनकी सुरक्षा के लिए हैं, न कि उनका तमाशा बनाने के लिए। अगर कंट्रोल रूम में बैठा कोई कर्मचारी किसी कपल का वीडियो बनाकर वायरल कर रहा है, तो यह 'वॉयरिज्म' (Voyeurism) का अपराध है। सिस्टम की पोल: अगर यह वीडियो किसी कर्मचारी ने अपने मोबाइल से रिकॉर्ड स्क्रीन को शूट करके वायरल किया है, तो यह दर्शाता है कि कंट्रोल रूम में मोबाइल ले जाने या डेटा रिकॉर्ड करने की छूट है, जो सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन है। निजता का हनन (Violation of Privacy): सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, निजता एक मौलिक अधिकार है। भले ही कोई सार्वजनिक स्थान पर गलत कर रहा हो, उसका सीसीटीवी फुटेज लीक करना आईटी एक्ट (IT Act) के तहत दंडनीय अपराध है। विशेषज्ञों का कहना है, "अगर आज एक कपल का वीडियो लीक हुआ है, तो कल किसी वीआईपी की मूवमेंट, किसी महिला यात्री की निजी जानकारी या सुरक्षा से जुड़ा कोई अन्य संवेदनशील डेटा भी लीक किया जा सकता है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला भी बन सकता है।" NCRTC का एक्शन: जांच के आदेश और सख्ती वीडियो वायरल होते ही NCRTC महकमे में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल प्रभाव से आंतरिक जांच (Internal Inquiry) शुरू कर दी है। NCRTC के सूत्रों के अनुसार: सोर्स की तलाश: तकनीकी टीम यह पता लगा रही है कि वीडियो किस तारीख का है, किस समय का है और उस वक्त ड्यूटी पर कौन से कर्मचारी तैनात थे। डिजिटल फोरेंसिक: यह जांच की जा रही है कि वीडियो सिस्टम से डाउनलोड किया गया है या स्क्रीन से मोबाइल द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। कड़ी कार्रवाई: अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जो भी कर्मचारी इस लीकेज के लिए जिम्मेदार पाया जाएगा, उसके खिलाफ न केवल विभागीय कार्रवाई होगी, बल्कि कानूनी मुकदमा भी दर्ज कराया जा सकता है। CCTV फुटेज लीक होने पर NCRTC सख़्त इस घटना का सबसे गंभीर पहलू यह है कि CCTV फुटेज लीक कैसे हुआ? रैपिड रेल का कंट्रोल रूम और उसका डेटा पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है। ऐसे में किसी निजी फुटेज का पब्लिक डोमेन में आना बड़ी लापरवाही माना जा रहा है। आंतरिक जांच शुरू: नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NCRTC) ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच बिठा दी है। लीकेज का स्रोत: अधिकारी यह पता लगा रहे हैं कि कंट्रोल रूम के किस कर्मचारी या सिस्टम के माध्यम से यह संवेदनशील फुटेज बाहर निकला और वायरल किया गया। डेटा प्राइवेसी: विशेषज्ञों का कहना है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए लगाए गए कैमरों का फुटेज इस तरह बाहर आना प्राइवेसी कानून का उल्लंघन है। कानूनी पहलू: कौन है असली गुनहगार? कानून की नजर में इस मामले में दो अलग-अलग अपराध हुए हैं: 1. छात्रों का अपराध (सार्वजनिक अश्लीलता): भारतीय न्याय संहिता (BNS) या पूर्व की IPC की धारा 294 के तहत सार्वजनिक स्थान पर अश्लील हरकत करना अपराध है। चूंकि वे स्कूली छात्र (संभवतः नाबालिग) लग रहे हैं, इसलिए उन पर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) के तहत कार्रवाई हो सकती है। उनकी काउंसलिंग की जा सकती है। 2. वीडियो लीक करने वाले का अपराध (डेटा चोरी): यह अपराध ज्यादा संगीन है। IT Act की धारा 66E: किसी की निजता का उल्लंघन करना और निजी अंगों या कृत्यों की तस्वीर/वीडियो प्रसारित करना। इसमें 3 साल तक की जेल और 2 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। IT Act की धारा 67: इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री का प्रसार करना। डेटा सुरक्षा कानून: आधिकारिक डेटा को लीक करना अनुबंध और विश्वास का उल्लंघन है। सार्वजनिक शिष्टाचार बनाम निगरानी (Public Decency vs Surveillance) यह घटना समाज के सामने दो बड़े सवाल खड़े करती है: पहला- गिरता नैतिक स्तर: स्कूली बच्चों द्वारा सार्वजनिक परिवहन में ऐसी हरकतें करना सामाजिक पतन और अभिभावकों की निगरानी में कमी को दर्शाता है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सोशल मीडिया और इंटरनेट के अनियंत्रित इस्तेमाल से किशोरों में 'सार्वजनिक और निजी' का अंतर खत्म होता जा रहा है। दूसरा- बिग ब्रदर इज़ वाचिंग यू (Big Brother is Watching): क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां हर वक्त कोई हमें देख रहा है और मजे ले रहा है? सुरक्षा के नाम पर लगाए गए कैमरे अगर ब्लैकमेलिंग या मनोरंजन का साधन बन जाएं, तो महिलाएं और आम नागरिक ट्रेन में चढ़ने से पहले सौ बार सोचेंगे। गाजियाबाद की एक नियमित यात्री, स्नेहा वर्मा कहती हैं, "मैं अक्सर रैपिड रेल से सफर करती हूं क्योंकि यह सुरक्षित है। लेकिन यह खबर सुनकर डर लग रहा है। अगर कल को मैं अपने बच्चे को दूध पिला रही हूं या कपड़े ठीक कर रही हूं और कोई गार्ड उसका वीडियो बनाकर वायरल कर दे तो? यह बहुत डरावना है।" आगे क्या? (What Next?) NCRTC के लिए यह एक 'वेक-अप कॉल' है। सिर्फ शानदार कोच और तेज रफ्तार इंजन बना देना काफी नहीं है। उस सिस्टम को चलाने वाले लोगों की मानसिकता और ईमानदारी भी 'वर्ल्ड क्लास' होनी चाहिए। सुझाव और अपेक्षाएं: मोबाइल बैन: कंट्रोल रूम में कर्मचारियों के मोबाइल ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। वाटरमार्क: सीसीटीवी फुटेज पर यूजर आईडी का वाटरमार्क होना चाहिए ताकि लीक होने पर तुरंत पता चल सके कि यह किसकी आईडी से देखा गया था। जागरूकता: स्कूलों और कॉलेजों में भी जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है कि सार्वजनिक स्थानों पर कैसा आचरण अपेक्षित है। फिलहाल, पुलिस और NCRTC की जांच जारी है। देखना होगा कि वीडियो लीक करने वाला वह 'चेहरा' कब बेनकाब होता है जिसने सुरक्षा तंत्र का मजाक बनाकर रख दिया है। जुड़े रहें 'खबरीलाल' के साथ। हम इस खबर पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। जैसे ही जांच रिपोर्ट आएगी, हम सबसे पहले आप तक पहुंचाएंगे।
बॉलीवुड और भारतीय टेलीविजन जगत के महान और बहुमुखी कलाकार सतीश शाह (Satish Shah) का आज (शनिवार, 25 अक्टूबर 2025) दुखद निधन हो गया है। अपनी लाजवाब कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसाने वाले सतीश शाह ने 74 वर्ष की उम्र में मुंबई में अपनी आखिरी सांस ली। वह लंबे समय से किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, और किडनी फेलियर को उनकी मौत का कारण बताया जा रहा है। उनके निधन की पुष्टि प्रोड्यूसर और IFTDA के अध्यक्ष अशोक पंडित ने की है। चरित्र अभिनेता और कॉमेडियन का सफर सतीश शाह का अभिनय करियर पाँच दशकों से अधिक लंबा रहा, जिसमें उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्मों और कई सफल टीवी सीरियल्स में काम किया। उनका जन्म 1951 में हुआ था और उन्होंने पुणे के FTII (Film and Television Institute of India) से प्रशिक्षण लिया था। टीवी जगत का आइकॉन: उन्हें सबसे ज्यादा पहचान हिट कॉमेडी सीरियल 'साराभाई वर्सेज साराभाई' में इंद्रावदन साराभाई (Indravadan Sarabhai) के किरदार से मिली। इस शो में उनके डायलॉग और एक्सप्रेशन आज भी कल्ट क्लासिक माने जाते हैं। 'ये जो है जिंदगी' (1984) में 55 अलग-अलग किरदार निभाकर उन्होंने घर-घर में अपनी पहचान बनाई थी। फिल्मी करियर की शुरुआत: उन्होंने 1983 की डार्क कॉमेडी फिल्म 'जाने भी दो यारों' में एक 'लाश' (Dead Body) का आइकॉनिक किरदार निभाया था, जिसने उन्हें रातोंरात पहचान दिलाई थी। प्रमुख फिल्में: उनकी कुछ यादगार बॉलीवुड फिल्मों में 'हम आपके हैं कौन', 'मुझसे शादी करोगी', 'कल हो ना हो' और शाहरुख खान अभिनीत 'मैं हूँ ना' शामिल हैं, जहाँ उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग से जान डाल दी। Read Also : थामा, और 'स्त्री 2' के म्यूजिक कंपोजर सचिन सांघवी गिरफ्तार, शादी और गाना देने का झांसा देकर 20 साल की युवती से यौन उत्पीड़न का आरोप किडनी फेलियर और निधन की पुष्टि मिली जानकारी के मुताबिक, अभिनेता सतीश शाह पिछले कुछ समय से किडनी संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्होंने आज दोपहर करीब 2:30 बजे अंतिम सांस ली। आधिकारिक रूप से किडनी फेलियर को उनकी मृत्यु का कारण बताया गया है। शाह के निधन की खबर सामने आने के बाद बॉलीवुड इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई है। इंडस्ट्री में शोक की लहर मशहूर निर्माता अशोक पंडित ने सतीश शाह के निधन की पुष्टि करते हुए कहा, "जी हाँ, सतीश शाह नहीं रहे। वो मेरे अच्छे मित्र थे। किडनी फेलियर के चलते उनका निधन हो गया है। इंडस्ट्री के लिए यह एक बड़ी क्षति है।" Public Reaction or Social Media: श्रद्धांजलि सतीश शाह के निधन की खबर से उनके फैंस स्तब्ध हैं। सोशल मीडिया पर उनके फैंस और फिल्मी सितारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है और उनके सबसे यादगार किरदारों को याद कर रहे हैं। 'साराभाई वर्सेज साराभाई' की कास्ट और क्रू ने भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है। सिनेमा में हास्य की क्षति सतीश शाह का निधन हिंदी सिनेमा में चरित्र अभिनय और हास्य की एक पीढ़ी का अंत है। उनकी अभिनय शैली और हास्य टाइमिंग हमेशा दर्शकों के दिलों में ज़िंदा रहेगी।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर मेरठ के लिए परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है। दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ आरआरटीएस (रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) कॉरिडोर के साथ ही मेरठ को अपनी पहली 'मेरठ मेट्रो' मिलने जा रही है। यह न केवल शहर के अंदर कनेक्टिविटी को सुधारेगी, बल्कि दिल्ली और गाजियाबाद जैसे शहरों से भी मेरठ के सफर को आसान और तेज बना देगी। आइए, मेरठ मेट्रो से जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी पर एक विस्तृत नजर डालते हैं: Meerut Metro की कब होगी शुरुआत? (Kab Shuru Hogi) मेरठ मेट्रो का संचालन, दिल्ली-मेरठ आरआरटीएस (जिसे 'नमो भारत' ट्रेन के नाम से भी जाना जाता है) के साथ ही शुरू होना प्रस्तावित है। हालिया अपडेट: खबरों के अनुसार, 30 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नमो भारत ट्रेन के आखिरी चरण (मेरठ साउथ से मोदीपुरम) और मेरठ मेट्रो का उद्घाटन किया जा सकता है। लक्ष्य: पूरी परियोजना (RRTS के साथ) को जून 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। प्राथमिकता खंड (साहिबाबाद से दुहाई) का परिचालन अक्टूबर 2023 में पहले ही शुरू हो चुका है। खासियत: यह देश का पहला ऐसा ट्रैक होगा जिस पर एक ही ट्रैक पर हाई-स्पीड नमो भारत ट्रेन और तीन कोच वाली मेरठ मेट्रो ट्रेन, दोनों एक साथ चलेंगी। रूट मैप (Route Map) और स्टेशन मेरठ मेट्रो कॉरिडोर दिल्ली-मेरठ RRTS कॉरिडोर का ही हिस्सा है। यह मुख्यतः मेरठ के शहरी क्षेत्र में सेवा प्रदान करेगी। कॉरिडोर का नाम: मेरठ दक्षिण से मोदीपुरम (Meerut South to Modipuram) कुल लंबाई: लगभग 23 किमी स्टेशनों की संख्या: इस कॉरिडोर में कुल 13 स्टेशन हैं। केवल मेट्रो स्टेशन: इनमें से 10 स्टेशन केवल मेरठ मेट्रो के लिए होंगे। RRTS और मेट्रो दोनों के लिए स्टेशन (Integrated Stations): मेरठ साउथ, बेगमपुल, और मोदीपुरम स्टेशन RRTS और मेरठ मेट्रो, दोनों की सेवाओं के लिए इंटीग्रेटेड (एकीकृत) होंगे। प्रमुख स्टेशन (संभावित): मेरठ साउथ, परतापुर, रिठानी, शताब्दी नगर, ब्रह्मपुरी, मेरठ सेंट्रल, भैसाली, बेगमपुल, एमईएस कॉलोनी, दौर्ली, मेरठ नॉर्थ, और मोदीपुरम। किराया (Kiraya) मेरठ मेट्रो का किराया दूरी के आधार पर तय किया जाएगा। यह किराया नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (NCRTC) द्वारा जारी किया जाएगा। नमो भारत (RRTS) का किराया (दिल्ली-मेरठ कॉरिडोर के लिए): मानक (Standard) कोच: ₹20 से शुरू होकर अधिकतम ₹150 तक हो सकता है (पूरे कॉरिडोर के लिए)। प्रीमियम (Premium) कोच: ₹30 से शुरू होकर अधिकतम ₹225 तक हो सकता है (पूरे कॉरिडोर के लिए)। मेरठ मेट्रो का अनुमानित किराया: चूंकि मेरठ मेट्रो की यात्रा दूरी RRTS की तुलना में कम होगी (शहर के भीतर), इसका किराया ₹20 से ₹50 के बीच होने की संभावना है, जो यात्रियों द्वारा तय की गई दूरी पर निर्भर करेगा। मेरठ मेट्रो की आगे की योजना (Aage Ka Plan) मेरठ मेट्रो का पहला चरण (मेरठ दक्षिण से मोदीपुरम) पूरा होने के बाद, आगे की योजनाओं में शहर के विकास और कनेक्टिविटी को बढ़ाना शामिल है: दूसरा कॉरिडोर प्रस्तावित: मेरठ मेट्रो के लिए दूसरा कॉरिडोर भी प्रस्तावित है, जिसका रूट श्रद्धापुरी एक्सटेंशन से जाग्रति विहार तक हो सकता है। इस पर अभी विस्तृत काम शुरू होना बाकी है। टाउनशिप और TOD: मेरठ में ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) मॉडल पर आधारित नई टाउनशिप का विकास किया जा रहा है। ये टाउनशिप RRTS/मेट्रो स्टेशनों के आस-पास होंगी, जिससे लोग अपने कार्यस्थल (Walk to Work) और जरूरी सुविधाओं तक आसानी से पहुँच सकेंगे। इससे 2029 तक 20,000 से अधिक रोजगार उत्पन्न होने का अनुमान है। फीडर सेवाएं: स्टेशनों से अंतिम-मील कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों के लिए फीडर सेवाओं को मजबूत करने की योजना है। मेरठ मेट्रो न केवल शहर के ट्रैफिक को कम करेगी बल्कि दिल्ली-एनसीआर से मेरठ की कनेक्टिविटी को भी मजबूत करेगी, जिससे यहां के निवासियों के लिए समय और पैसे दोनों की बचत होगी। यह परियोजना मेरठ को देश के सबसे आधुनिक परिवहन नेटवर्क वाले शहरों की श्रेणी में खड़ा कर देगी।