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एक्सपर्ट्स के मुताबिक, गर्म और गंदे पानी में पनपता है यह अमीबा, शरीर में नाक के जरिए करता है प्रवेश; बच्चों को सबसे ज़्यादा खतरा

दुनियाभर में 500 से कम केस, लेकिन केरल में क्यों 19 लोगों की जान ले चुका है 'ब्रेन-ईटिंग अमीबा'? जानें वजह और बचाव के तरीके

Unknown सितम्बर 21, 2025 0
"Brain-Eating Amoeba: Under 500 Cases Worldwide but 19 Deaths in Kerala — Causes & Prevention"
"Brain-Eating Amoeba: Under 500 Cases Worldwide but 19 Deaths in Kerala — Causes & Prevention"
केरल: केरल में 'ब्रेन-ईटिंग अमीबा' (Naegleria fowleri) के बढ़ते मामले चिंता का विषय बन गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जहाँ दुनियाभर में इस दुर्लभ संक्रमण के 500 से भी कम मामले सामने आए हैं, वहीं अकेले केरल में 120 से ज़्यादा केस दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 19 लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीमारी का कोई सटीक इलाज या वैक्सीन नहीं होने के कारण यह बेहद जानलेवा साबित होती है।READ ALSO:-Amazon-Flipkart सेल में ऐसे मिलेगा एक्स्ट्रा डिस्काउंट, जानिए 3 शानदार तरीके

 

क्या है ब्रेन-ईटिंग अमीबा?
सफदरजंग अस्पताल के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. जुगल किशोर के अनुसार, यह अमीबा गंदे और गर्म मीठे पानी में पनपता है। यह पीने के पानी से शरीर में प्रवेश नहीं करता, बल्कि नाक के रास्ते से दिमाग तक पहुँचता है। जब कोई व्यक्ति प्रदूषित तालाब, झील या स्विमिंग पूल में नहाता या तैरता है और पानी नाक के अंदर चला जाता है, तो यह अमीबा सीधे मस्तिष्क में पहुँचकर संक्रमण फैलाता है, जिसे प्राइमरी अमीबिक मेनिंजोएन्सेफलाइटिस (PAM) कहा जाता है।

 

डॉ. किशोर बताते हैं कि इस संक्रमण के शुरुआती लक्षण सामान्य फ्लू जैसे होते हैं, जैसे सिरदर्द, बुखार और थकान। लेकिन, यह तेजी से बढ़ता है और बाद में मरीज को भ्रम, दौरे और कोमा जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ता है। इसकी मृत्यु दर 95% से भी अधिक है।

 

केरल में क्यों बढ़ रहा है खतरा?
दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में मेडिसिन विभाग के डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सुभाष गिरि के मुताबिक, केरल में इस अमीबा के अधिक मामले सामने आने की कुछ खास वजहें हो सकती हैं:
  • गर्म और आर्द्र जलवायु: केरल की जलवायु इस अमीबा के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है।
  • प्रदूषित जलाशय: लगातार बारिश के बाद बनने वाले तालाब और झीलों का लोग रोजमर्रा के कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
  • खराब रखरखाव: शहरी इलाकों में स्विमिंग पूल्स की सही साफ-सफाई न होने से भी यह संक्रमण फैल सकता है।

 

कैसे करें बचाव?
इस खतरनाक बीमारी से बचाव ही एकमात्र उपाय है। इन तरीकों को अपनाकर आप खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं:
  1. साफ पानी का उपयोग: पीने और नहाने के लिए हमेशा स्वच्छ या उबले हुए पानी का ही इस्तेमाल करें।
  2. सावधानी बरतें: खुले जलाशयों जैसे तालाबों और झीलों में नहाते समय यह सुनिश्चित करें कि पानी आपकी नाक में न जाए।
  3. पूल की सफाई: स्विमिंग पूल्स को नियमित रूप से क्लोरीन और अन्य रसायनों से साफ करवाएं।
  4. लक्षणों पर ध्यान दें: अगर आपको सिरदर्द, बुखार, उल्टी या गर्दन में अकड़न जैसे लक्षण दिखें तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
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बाथरूम में बिछी 'मौत की वायरिंग': नहाने गए सिपाही का बाल्टी में ही रह गया हाथ, इमर्शन रॉड के करंट ने ली जान; मेरठ में नम आंखों से दी गई विदाई

आगरा/मेरठ (Agra/Meerut News): उत्तर प्रदेश के आगरा में सर्दी की शुरुआत के साथ ही एक बेहद दर्दनाक हादसा सामने आया है। यहां मलपुरा थाने में तैनात 29 वर्षीय सिपाही निखिल मोतला (Constable Nikhil Motla) की बाथरूम में नहाते समय संदिग्ध परिस्थितियों में करंट लगने से मौत हो गई। बताया जा रहा है कि पानी गर्म करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इमर्शन रॉड (Immersion Rod) से बाल्टी के पानी में करंट उतर आया, जिसकी चपेट में आने से सिपाही की जान चली गई।READ ALSO:-मेरठ में 'रक्तचरित्र': मां के सामने बेटे के सीने में उतार दी गोलियां, वकील बनने से पहले ही छात्र को मिली मौत; जीजा ने लिया 'लव मैरिज' का खूनी बदला   मूल रूप से मेरठ के दादरी सकौती के रहने वाले निखिल की मौत की खबर जैसे ही उनके पैतृक गांव पहुंची, वहां कोहराम मच गया। शुक्रवार सुबह जब उनका शव गांव पहुंचा तो सपा विधायक अतुल प्रधान सहित हजारों लोगों ने नम आंखों से उन्हें विदाई दी।   बंद कमरे में क्या हुआ उस वक्त? घटना आगरा के बमरौली रोड स्थित केसीआर कॉलोनी की है, जहां निखिल अपने बचपन के दोस्त और साथी सिपाही आशीष के साथ किराए के मकान में रहते थे। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, यह हादसा गुरुवार सुबह हुआ। निखिल को सुबह ड्यूटी पर जाना था। ठंड के कारण उन्होंने नहाने के लिए बाथरूम में बाल्टी में पानी गर्म करने के लिए इमर्शन रॉड लगाई थी। प्लग ऑन करने के बाद वे कुछ देर के लिए कमरे में आए और वर्दी तैयार करने लगे। कुछ देर बाद जब उन्हें लगा कि पानी गर्म हो गया होगा, तो वे नहाने के लिए बाथरूम में चले गए।   दोस्त ने देखा खौफनाक मंजर निखिल के रूममेट और सिपाही आशीष ने बताया कि करीब 20 मिनट तक जब बाथरूम से पानी गिरने की आवाज नहीं आई और निखिल बाहर नहीं निकले, तो उन्हें शक हुआ। आशीष ने कई बार आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अनहोनी की आशंका में जब आशीष बाथरूम की तरफ गए, तो दरवाजा खुला था।   अंदर का नजारा देखकर आशीष के होश उड़ गए। निखिल फर्श पर अचेत पड़े थे और उनका एक हाथ पानी की बाल्टी के अंदर ही था। बाल्टी में इमर्शन रॉड (Immersion Rod Accident) चालू हालत में थी।   बचाने के प्रयास में दोस्त को भी लगा करंट आशीष ने बताया कि जैसे ही उन्होंने निखिल को उठाने की कोशिश की, उन्हें भी जोरदार बिजली का झटका लगा। समझदारी दिखाते हुए उन्होंने तुरंत स्विच बोर्ड से रॉड का प्लग बंद किया और तार को बाल्टी से बाहर खींचा। इसके बाद आनन-फानन में निखिल को ग्वालियर रोड स्थित नवभारत हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।   2021 बैच के सिपाही थे निखिल, 8 महीने की है बेटी निखिल मोतला 2021 बैच के आरक्षी थे और करीब 8 महीने पहले ही उनकी तैनाती आगरा के मलपुरा थाने में हुई थी। उनके पिता प्रदीप मोतला मेरठ के कद्दावर किसान नेता हैं और मंडौरा समिति के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है क्योंकि निखिल की शादी महज डेढ़ साल पहले ही हुई थी। उनकी 8 महीने की एक मासूम बेटी है, जिसके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया। निखिल मंगलवार को ही छुट्टी खत्म करके वापस ड्यूटी पर आगरा लौटे थे।   पुलिस विभाग में शोक की लहर सिपाही की मौत की सूचना मिलते ही एसीपी डॉ. सुकन्या शर्मा और डीसीपी पश्चिमी जोन अतुल शर्मा अस्पताल और पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे। अधिकारियों ने बताया कि आशीष और निखिल बचपन के दोस्त थे, साथ पढ़े और साथ ही पुलिस में भर्ती हुए थे। पोस्टमार्टम के बाद पुलिस लाइन में निखिल को श्रद्धांजलि दी गई और शव को सम्मान के साथ मेरठ भेजा गया।   एक्सपर्ट की राय: इमर्शन रॉड इस्तेमाल करते समय बरतें सावधानी   सर्दियों में इमर्शन रॉड से सिपाही की मौत (Agra Constable Electrocution) जैसी घटनाएं आम हो जाती हैं। बिजली एक्सपर्ट्स का कहना है कि इमर्शन रॉड एक सस्ता और पोर्टेबल वाटर हीटर है, लेकिन इसमें ऑटो-कट फीचर नहीं होता।   पानी चेक न करें: रॉड चालू होने पर पानी में कभी उंगली डालकर तापमान चेक न करें। प्लास्टिक की बाल्टी: हो सके तो अच्छी क्वालिटी की प्लास्टिक बाल्टी का प्रयोग करें, लोहे की बाल्टी में करंट फैलने का खतरा 100% होता है। स्विच ऑफ करें: नहाने जाने से पहले प्लग को सॉकेट से पूरी तरह निकाल दें, केवल स्विच ऑफ करना काफी नहीं है। अर्थिंग: घर में अर्थिंग का सही होना बेहद जरूरी है।   आगरा में हुए इस हादसे ने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया है। सिपाही निखिल मोतला की मौत हम सभी के लिए एक चेतावनी है कि बिजली के उपकरणों, खासकर इमर्शन रॉड का इस्तेमाल करते समय थोड़ी सी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।

नमो भारत या 'शर्मसार' भारत? रैपिड रेल के CCTV से लीक हुआ स्कूली छात्र-छात्रा का 'प्राइवेट वीडियो', सुरक्षा के दावे फेल, NCRTC के कंट्रोल रूम में किसकी मिलीभगत?

देश की राजधानी दिल्ली को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जोड़ने वाली हाईस्पीड महत्वाकांक्षी परियोजना 'नमो भारत' (Namo Bharat) यानी रैपिड रेल एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इस बार वजह इसकी रफ़्तार, वर्ल्ड क्लास सुविधाएं या तकनीकी उत्कृष्टता नहीं है। इस बार वजह है एक ऐसा वीडियो जिसने न केवल सार्वजनिक मर्यादाओं को तार-तार किया है, बल्कि रेलवे के 'सुरक्षित सफर' के दावे पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।   सोशल मीडिया पर पिछले 24 घंटों से एक वीडियो जंगल की आग की तरह वायरल हो रहा है। वीडियो नमो भारत ट्रेन के एक कोच के भीतर का है, जिसमें एक प्रेमी युगल (जो स्कूली ड्रेस में नजर आ रहा है) बेहद आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दे रहा है। हालांकि, मामला सिर्फ अश्लीलता का नहीं है। इस घटना ने एक बहुत बड़े खतरे की घंटी बजा दी है—और वह खतरा है 'डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा में सेंध' का। आखिर एक अति-सुरक्षित कंट्रोल रूम से सीसीटीवी फुटेज बाहर कैसे आया?   क्या है वायरल वीडियो में? (The Viral Content) प्राप्त जानकारी के अनुसार, वायरल हो रहा वीडियो मेरठ से गाजियाबाद के बीच चलने वाली रैपिड रेल के किसी कोच का है।   पात्र: वीडियो में दिख रहे युवक और युवती की उम्र कम लग रही है और दोनों ने स्कूल यूनिफॉर्म (School Dress) पहनी हुई है। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि वे किसी स्कूल के छात्र हैं। घटनाक्रम: कोच में अन्य यात्रियों की संख्या न के बराबर थी। खाली सीटों और एकांत का फायदा उठाकर यह युगल मर्यादा की सभी सीमाएं लांघते हुए अश्लील हरकतें (Obscene Acts) करता नजर आया। कैमरा एंगल: वीडियो को देखकर साफ पता चलता है कि इसे किसी मोबाइल से रिकॉर्ड नहीं किया गया, बल्कि यह ऊपर लगे CCTV कैमरे की रिकॉर्डिंग है। वीडियो में टाइम स्टैम्प और कैमरा आईडी जैसी तकनीकी डीटेल्स भी देखी जा सकती हैं, जो पुष्टि करती हैं कि यह आधिकारिक फुटेज है।   दिल्ली मेट्रो की राह पर नमो भारत? यह पहली बार नहीं है जब किसी पब्लिक ट्रांसपोर्ट में ऐसी घटना हुई हो। इससे पहले दिल्ली मेट्रो (Delhi Metro) भी ऐसे ही कारणों से बदनाम हो चुकी है। वहां भी आए दिन 'किसिंग वीडियो' और आपत्तिजनक हरकतें वायरल होती रहती हैं। लेकिन नमो भारत में हुई यह घटना इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि यह एक प्रीमियम और हाई-सिक्योरिटी ट्रांसपोर्ट सिस्टम है, जिसका संचालन और निगरानी बेहद सख्त मानी जाती है।   सोशल मीडिया पर लोग अब तंज कस रहे हैं कि "क्या दिल्ली मेट्रो का वायरल वायरस अब नमो भारत तक पहुंच गया है?"   असली मुद्दा: बेडरूम तक नहीं, कंट्रोल रूम तक है खतरा (The Real Scandal: CCTV Leak) इस पूरे मामले में स्कूली छात्रों की हरकत निंदनीय हो सकती है, लेकिन उससे भी बड़ा और गंभीर अपराध वह है जो NCRTC (National Capital Region Transport Corporation) के भीतर हुआ है।   सवाल यह है कि CCTV फुटेज पब्लिक डोमेन में किसने डाला? रैपिड रेल में यात्रियों की सुरक्षा के लिए हाई-डेफिनिशन कैमरे लगाए गए हैं। इनका लाइव फीड और रिकॉर्डिंग केवल अधिकृत सुरक्षा कर्मियों और कंट्रोल रूम के अधिकारियों के पास होती है। यह डेटा बेहद संवेदनशील (Sensitive Data) माना जाता है।   विश्वासघात (Breach of Trust): यात्री इस भरोसे के साथ सफर करते हैं कि कैमरे उनकी सुरक्षा के लिए हैं, न कि उनका तमाशा बनाने के लिए। अगर कंट्रोल रूम में बैठा कोई कर्मचारी किसी कपल का वीडियो बनाकर वायरल कर रहा है, तो यह 'वॉयरिज्म' (Voyeurism) का अपराध है। सिस्टम की पोल: अगर यह वीडियो किसी कर्मचारी ने अपने मोबाइल से रिकॉर्ड स्क्रीन को शूट करके वायरल किया है, तो यह दर्शाता है कि कंट्रोल रूम में मोबाइल ले जाने या डेटा रिकॉर्ड करने की छूट है, जो सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन है। निजता का हनन (Violation of Privacy): सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, निजता एक मौलिक अधिकार है। भले ही कोई सार्वजनिक स्थान पर गलत कर रहा हो, उसका सीसीटीवी फुटेज लीक करना आईटी एक्ट (IT Act) के तहत दंडनीय अपराध है।   विशेषज्ञों का कहना है, "अगर आज एक कपल का वीडियो लीक हुआ है, तो कल किसी वीआईपी की मूवमेंट, किसी महिला यात्री की निजी जानकारी या सुरक्षा से जुड़ा कोई अन्य संवेदनशील डेटा भी लीक किया जा सकता है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला भी बन सकता है।"   NCRTC का एक्शन: जांच के आदेश और सख्ती वीडियो वायरल होते ही NCRTC महकमे में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल प्रभाव से आंतरिक जांच (Internal Inquiry) शुरू कर दी है।   NCRTC के सूत्रों के अनुसार: सोर्स की तलाश: तकनीकी टीम यह पता लगा रही है कि वीडियो किस तारीख का है, किस समय का है और उस वक्त ड्यूटी पर कौन से कर्मचारी तैनात थे। डिजिटल फोरेंसिक: यह जांच की जा रही है कि वीडियो सिस्टम से डाउनलोड किया गया है या स्क्रीन से मोबाइल द्वारा रिकॉर्ड किया गया है। कड़ी कार्रवाई: अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जो भी कर्मचारी इस लीकेज के लिए जिम्मेदार पाया जाएगा, उसके खिलाफ न केवल विभागीय कार्रवाई होगी, बल्कि कानूनी मुकदमा भी दर्ज कराया जा सकता है।   CCTV फुटेज लीक होने पर NCRTC सख़्त इस घटना का सबसे गंभीर पहलू यह है कि CCTV फुटेज लीक कैसे हुआ? रैपिड रेल का कंट्रोल रूम और उसका डेटा पूरी तरह सुरक्षित माना जाता है। ऐसे में किसी निजी फुटेज का पब्लिक डोमेन में आना बड़ी लापरवाही माना जा रहा है।      आंतरिक जांच शुरू: नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NCRTC) ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच बिठा दी है। लीकेज का स्रोत: अधिकारी यह पता लगा रहे हैं कि कंट्रोल रूम के किस कर्मचारी या सिस्टम के माध्यम से यह संवेदनशील फुटेज बाहर निकला और वायरल किया गया।  डेटा प्राइवेसी: विशेषज्ञों का कहना है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए लगाए गए कैमरों का फुटेज इस तरह बाहर आना प्राइवेसी कानून का उल्लंघन है।     कानूनी पहलू: कौन है असली गुनहगार? कानून की नजर में इस मामले में दो अलग-अलग अपराध हुए हैं:   1. छात्रों का अपराध (सार्वजनिक अश्लीलता): भारतीय न्याय संहिता (BNS) या पूर्व की IPC की धारा 294 के तहत सार्वजनिक स्थान पर अश्लील हरकत करना अपराध है। चूंकि वे स्कूली छात्र (संभवतः नाबालिग) लग रहे हैं, इसलिए उन पर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (JJ Act) के तहत कार्रवाई हो सकती है। उनकी काउंसलिंग की जा सकती है।   2. वीडियो लीक करने वाले का अपराध (डेटा चोरी): यह अपराध ज्यादा संगीन है। IT Act की धारा 66E: किसी की निजता का उल्लंघन करना और निजी अंगों या कृत्यों की तस्वीर/वीडियो प्रसारित करना। इसमें 3 साल तक की जेल और 2 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। IT Act की धारा 67: इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील सामग्री का प्रसार करना। डेटा सुरक्षा कानून: आधिकारिक डेटा को लीक करना अनुबंध और विश्वास का उल्लंघन है।   सार्वजनिक शिष्टाचार बनाम निगरानी (Public Decency vs Surveillance) यह घटना समाज के सामने दो बड़े सवाल खड़े करती है:   पहला- गिरता नैतिक स्तर: स्कूली बच्चों द्वारा सार्वजनिक परिवहन में ऐसी हरकतें करना सामाजिक पतन और अभिभावकों की निगरानी में कमी को दर्शाता है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि सोशल मीडिया और इंटरनेट के अनियंत्रित इस्तेमाल से किशोरों में 'सार्वजनिक और निजी' का अंतर खत्म होता जा रहा है।   दूसरा- बिग ब्रदर इज़ वाचिंग यू (Big Brother is Watching): क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां हर वक्त कोई हमें देख रहा है और मजे ले रहा है? सुरक्षा के नाम पर लगाए गए कैमरे अगर ब्लैकमेलिंग या मनोरंजन का साधन बन जाएं, तो महिलाएं और आम नागरिक ट्रेन में चढ़ने से पहले सौ बार सोचेंगे।   गाजियाबाद की एक नियमित यात्री, स्नेहा वर्मा कहती हैं, "मैं अक्सर रैपिड रेल से सफर करती हूं क्योंकि यह सुरक्षित है। लेकिन यह खबर सुनकर डर लग रहा है। अगर कल को मैं अपने बच्चे को दूध पिला रही हूं या कपड़े ठीक कर रही हूं और कोई गार्ड उसका वीडियो बनाकर वायरल कर दे तो? यह बहुत डरावना है।"   आगे क्या? (What Next?) NCRTC के लिए यह एक 'वेक-अप कॉल' है। सिर्फ शानदार कोच और तेज रफ्तार इंजन बना देना काफी नहीं है। उस सिस्टम को चलाने वाले लोगों की मानसिकता और ईमानदारी भी 'वर्ल्ड क्लास' होनी चाहिए।   सुझाव और अपेक्षाएं: मोबाइल बैन: कंट्रोल रूम में कर्मचारियों के मोबाइल ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए। वाटरमार्क: सीसीटीवी फुटेज पर यूजर आईडी का वाटरमार्क होना चाहिए ताकि लीक होने पर तुरंत पता चल सके कि यह किसकी आईडी से देखा गया था। जागरूकता: स्कूलों और कॉलेजों में भी जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है कि सार्वजनिक स्थानों पर कैसा आचरण अपेक्षित है।   फिलहाल, पुलिस और NCRTC की जांच जारी है। देखना होगा कि वीडियो लीक करने वाला वह 'चेहरा' कब बेनकाब होता है जिसने सुरक्षा तंत्र का मजाक बनाकर रख दिया है।     जुड़े रहें 'खबरीलाल' के साथ। हम इस खबर पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। जैसे ही जांच रिपोर्ट आएगी, हम सबसे पहले आप तक पहुंचाएंगे।

बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता सतीश शाह का निधन, 74 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस; Kidney की बीमारी बनी मौत का कारण

बॉलीवुड और भारतीय टेलीविजन जगत के महान और बहुमुखी कलाकार सतीश शाह (Satish Shah) का आज (शनिवार, 25 अक्टूबर 2025) दुखद निधन हो गया है। अपनी लाजवाब कॉमिक टाइमिंग से दर्शकों को हंसाने वाले सतीश शाह ने 74 वर्ष की उम्र में मुंबई में अपनी आखिरी सांस ली। वह लंबे समय से किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, और किडनी फेलियर को उनकी मौत का कारण बताया जा रहा है। उनके निधन की पुष्टि प्रोड्यूसर और IFTDA के अध्यक्ष अशोक पंडित ने की है।   चरित्र अभिनेता और कॉमेडियन का सफर सतीश शाह का अभिनय करियर पाँच दशकों से अधिक लंबा रहा, जिसमें उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्मों और कई सफल टीवी सीरियल्स में काम किया। उनका जन्म 1951 में हुआ था और उन्होंने पुणे के FTII (Film and Television Institute of India) से प्रशिक्षण लिया था।   टीवी जगत का आइकॉन: उन्हें सबसे ज्यादा पहचान हिट कॉमेडी सीरियल 'साराभाई वर्सेज साराभाई' में इंद्रावदन साराभाई (Indravadan Sarabhai) के किरदार से मिली। इस शो में उनके डायलॉग और एक्सप्रेशन आज भी कल्ट क्लासिक माने जाते हैं। 'ये जो है जिंदगी' (1984) में 55 अलग-अलग किरदार निभाकर उन्होंने घर-घर में अपनी पहचान बनाई थी।   फिल्मी करियर की शुरुआत: उन्होंने 1983 की डार्क कॉमेडी फिल्म 'जाने भी दो यारों' में एक 'लाश' (Dead Body) का आइकॉनिक किरदार निभाया था, जिसने उन्हें रातोंरात पहचान दिलाई थी। प्रमुख फिल्में: उनकी कुछ यादगार बॉलीवुड फिल्मों में 'हम आपके हैं कौन', 'मुझसे शादी करोगी', 'कल हो ना हो' और शाहरुख खान अभिनीत 'मैं हूँ ना' शामिल हैं, जहाँ उन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग से जान डाल दी।   Read Also : थामा, और 'स्त्री 2' के म्यूजिक कंपोजर सचिन सांघवी गिरफ्तार, शादी और गाना देने का झांसा देकर 20 साल की युवती से यौन उत्पीड़न का आरोप   किडनी फेलियर और निधन की पुष्टि मिली जानकारी के मुताबिक, अभिनेता सतीश शाह पिछले कुछ समय से किडनी संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्होंने आज दोपहर करीब 2:30 बजे अंतिम सांस ली। आधिकारिक रूप से किडनी फेलियर को उनकी मृत्यु का कारण बताया गया है। शाह के निधन की खबर सामने आने के बाद बॉलीवुड इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई है।   इंडस्ट्री में शोक की लहर मशहूर निर्माता अशोक पंडित ने सतीश शाह के निधन की पुष्टि करते हुए कहा, "जी हाँ, सतीश शाह नहीं रहे। वो मेरे अच्छे मित्र थे। किडनी फेलियर के चलते उनका निधन हो गया है। इंडस्ट्री के लिए यह एक बड़ी क्षति है।"   Public Reaction or Social Media: श्रद्धांजलि सतीश शाह के निधन की खबर से उनके फैंस स्तब्ध हैं। सोशल मीडिया पर उनके फैंस और फिल्मी सितारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है और उनके सबसे यादगार किरदारों को याद कर रहे हैं। 'साराभाई वर्सेज साराभाई' की कास्ट और क्रू ने भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है।   सिनेमा में हास्य की क्षति सतीश शाह का निधन हिंदी सिनेमा में चरित्र अभिनय और हास्य की एक पीढ़ी का अंत है। उनकी अभिनय शैली और हास्य टाइमिंग हमेशा दर्शकों के दिलों में ज़िंदा रहेगी।

दिल्ली-मेरठ Rapid Rail के साथ दौड़ने को तैयार 'Meerut Metro': जानें रूट, किराया, लागत और उद्घाटन की तारीख

उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर मेरठ के लिए परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है। दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ आरआरटीएस (रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम) कॉरिडोर के साथ ही मेरठ को अपनी पहली 'मेरठ मेट्रो' मिलने जा रही है। यह न केवल शहर के अंदर कनेक्टिविटी को सुधारेगी, बल्कि दिल्ली और गाजियाबाद जैसे शहरों से भी मेरठ के सफर को आसान और तेज बना देगी।   आइए, मेरठ मेट्रो से जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी पर एक विस्तृत नजर डालते हैं:   Meerut Metro की कब होगी शुरुआत? (Kab Shuru Hogi)   मेरठ मेट्रो का संचालन, दिल्ली-मेरठ आरआरटीएस (जिसे 'नमो भारत' ट्रेन के नाम से भी जाना जाता है) के साथ ही शुरू होना प्रस्तावित है। हालिया अपडेट: खबरों के अनुसार, 30 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नमो भारत ट्रेन के आखिरी चरण (मेरठ साउथ से मोदीपुरम) और मेरठ मेट्रो का उद्घाटन किया जा सकता है। लक्ष्य: पूरी परियोजना (RRTS के साथ) को जून 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। प्राथमिकता खंड (साहिबाबाद से दुहाई) का परिचालन अक्टूबर 2023 में पहले ही शुरू हो चुका है। खासियत: यह देश का पहला ऐसा ट्रैक होगा जिस पर एक ही ट्रैक पर हाई-स्पीड नमो भारत ट्रेन और तीन कोच वाली मेरठ मेट्रो ट्रेन, दोनों एक साथ चलेंगी।   रूट मैप (Route Map) और स्टेशन   मेरठ मेट्रो कॉरिडोर दिल्ली-मेरठ RRTS कॉरिडोर का ही हिस्सा है। यह मुख्यतः मेरठ के शहरी क्षेत्र में सेवा प्रदान करेगी। कॉरिडोर का नाम: मेरठ दक्षिण से मोदीपुरम (Meerut South to Modipuram) कुल लंबाई: लगभग 23 किमी स्टेशनों की संख्या: इस कॉरिडोर में कुल 13 स्टेशन हैं। केवल मेट्रो स्टेशन: इनमें से 10 स्टेशन केवल मेरठ मेट्रो के लिए होंगे। RRTS और मेट्रो दोनों के लिए स्टेशन (Integrated Stations): मेरठ साउथ, बेगमपुल, और मोदीपुरम स्टेशन RRTS और मेरठ मेट्रो, दोनों की सेवाओं के लिए इंटीग्रेटेड (एकीकृत) होंगे। प्रमुख स्टेशन (संभावित): मेरठ साउथ, परतापुर, रिठानी, शताब्दी नगर, ब्रह्मपुरी, मेरठ सेंट्रल, भैसाली, बेगमपुल, एमईएस कॉलोनी, दौर्ली, मेरठ नॉर्थ, और मोदीपुरम। किराया (Kiraya) मेरठ मेट्रो का किराया दूरी के आधार पर तय किया जाएगा। यह किराया नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (NCRTC) द्वारा जारी किया जाएगा। नमो भारत (RRTS) का किराया (दिल्ली-मेरठ कॉरिडोर के लिए): मानक (Standard) कोच: ₹20 से शुरू होकर अधिकतम ₹150 तक हो सकता है (पूरे कॉरिडोर के लिए)। प्रीमियम (Premium) कोच: ₹30 से शुरू होकर अधिकतम ₹225 तक हो सकता है (पूरे कॉरिडोर के लिए)। मेरठ मेट्रो का अनुमानित किराया: चूंकि मेरठ मेट्रो की यात्रा दूरी RRTS की तुलना में कम होगी (शहर के भीतर), इसका किराया ₹20 से ₹50 के बीच होने की संभावना है, जो यात्रियों द्वारा तय की गई दूरी पर निर्भर करेगा। मेरठ मेट्रो की आगे की योजना (Aage Ka Plan) मेरठ मेट्रो का पहला चरण (मेरठ दक्षिण से मोदीपुरम) पूरा होने के बाद, आगे की योजनाओं में शहर के विकास और कनेक्टिविटी को बढ़ाना शामिल है: दूसरा कॉरिडोर प्रस्तावित: मेरठ मेट्रो के लिए दूसरा कॉरिडोर भी प्रस्तावित है, जिसका रूट श्रद्धापुरी एक्सटेंशन से जाग्रति विहार तक हो सकता है। इस पर अभी विस्तृत काम शुरू होना बाकी है। टाउनशिप और TOD: मेरठ में ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) मॉडल पर आधारित नई टाउनशिप का विकास किया जा रहा है। ये टाउनशिप RRTS/मेट्रो स्टेशनों के आस-पास होंगी, जिससे लोग अपने कार्यस्थल (Walk to Work) और जरूरी सुविधाओं तक आसानी से पहुँच सकेंगे। इससे 2029 तक 20,000 से अधिक रोजगार उत्पन्न होने का अनुमान है। फीडर सेवाएं: स्टेशनों से अंतिम-मील कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों के लिए फीडर सेवाओं को मजबूत करने की योजना है। मेरठ मेट्रो न केवल शहर के ट्रैफिक को कम करेगी बल्कि दिल्ली-एनसीआर से मेरठ की कनेक्टिविटी को भी मजबूत करेगी, जिससे यहां के निवासियों के लिए समय और पैसे दोनों की बचत होगी। यह परियोजना मेरठ को देश के सबसे आधुनिक परिवहन नेटवर्क वाले शहरों की श्रेणी में खड़ा कर देगी।

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खबरीलाल डेस्क

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Free TAVI Surgery in Lucknow Heart Disease Institute to Start Valve Replacement Without Open Surgery
लखनऊ: दिल के मरीजों के लिए बड़ी राहत, अब बिना चीर-फाड़ के फ्री में होगी 'तावी' सर्जरी; बचेंगे 15 लाख रुपये

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से दिल (Heart) की बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए एक बेहद राहत देने वाली खबर सामने आई है। अब तक जिन मरीजों को हार्ट वॉल्व (Heart Valve) की समस्या के चलते ओपन हार्ट सर्जरी (Open Heart Surgery) के दर्दनाक और जोखिम भरे रास्ते से गुजरना पड़ता था, उन्हें अब एक नई और आधुनिक तकनीक का तोहफा मिला है। शहर के हृदय रोग संस्थान (Heart Disease Institute) ने 'तावी' (TAVI - Transcatheter Aortic Valve Implantation) विधि से इलाज शुरू करने का फैसला किया है। सबसे बड़ी खुशखबरी यह है कि निजी अस्पतालों में जिस इलाज का खर्च 15 से 20 लाख रुपये आता है, वह यहां पूरी तरह मुफ्त (Free) होगा।READ ALSO:-यूपी में वोटरों पर 'कागज' का संकट: 2003 की लिस्ट में नाम नहीं तो 'निवास प्रमाण पत्र' भी बेकार; आयोग ने कहा- 'सिर्फ ये 11 सबूत चलेंगे'   इसके साथ ही, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) भी हार्ट ट्रांसप्लांट (Heart Transplant) के लिए पूरी तरह तैयार है, लेकिन डोनर (अंगदान करने वाले) न मिलने के कारण यह प्रक्रिया रुकी हुई है। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम जानेंगे कि आखिर यह 'तावी' तकनीक क्या है, मरीजों को इसका लाभ कैसे मिलेगा और अंगदान को लेकर क्या चुनौतियां सामने आ रही हैं।   इतिहास में पहली बार: लखनऊ में फ्री 'तावी' (TAVI) सर्जरी मेडिकल साइंस ने पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व तरक्की की है, और Lucknow TAVI Surgery की यह पहल उसी दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। हृदय रोग संस्थान के वरिष्ठ चिकित्सकों के अनुसार, वॉल्व की बीमारी से ग्रस्त मरीजों के लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है।   अभी तक की स्थिति यह थी कि जब भी किसी मरीज के दिल का वॉल्व खराब होता था या उसमें सिकुड़न आ जाती थी, तो डॉक्टरों के पास केवल 'ओपन हार्ट सर्जरी' ही एकमात्र विकल्प बचता था। इसमें मरीज की छाती को चीरकर ऑपरेशन किया जाता है, जिसमें रिकवरी का समय लंबा होता है और संक्रमण का खतरा भी बना रहता है। विशेषकर बुजुर्ग मरीजों के लिए ओपन सर्जरी जानलेवा साबित हो सकती है। लेकिन 'तावी' विधि ने इस पूरे परिदृश्य को बदल दिया है।   क्या है तावी (TAVI) तकनीक? 'तावी' यानी ट्रांसकैथेटर एरोटिक वॉल्व इंप्लाटेशन (Transcatheter Aortic Valve Implantation)। यह एक 'मिनिमली इनवेसिव' (Minimally Invasive) प्रक्रिया है।   बिना चीर-फाड़ के इलाज: इस विधि में छाती को चीरने की जरूरत नहीं पड़ती। जांघ की नस से रास्ता: डॉक्टरों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में मरीज की जांघ (Groin) की नस (Femoral Artery) के जरिए एक कैथेटर (पतली नली) को दिल तक पहुंचाया जाता है। नया वॉल्व: इसी कैथेटर के जरिए सिकुड़े हुए या खराब वॉल्व के स्थान पर एक नया कृत्रिम वॉल्व (Artificial Valve) फिट कर दिया जाता है। वॉल्व कवच: यह नया वॉल्व पुराने वॉल्व के अंदर फिट होकर एक 'कवच' की तरह काम करता है और रक्त प्रवाह को सुचारू रूप से बहाल कर देता है।   30 मरीजों पर होगा पहला परीक्षण: डॉ. संतोष सिन्हा हृदय रोग संस्थान के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. संतोष सिन्हा ने इस नई पहल के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह प्रक्रिया शुरू करने के लिए संस्थान पूरी तरह तैयार है।   "पहले चरण में हम ऐसे 30 मरीजों का चयन करेंगे जिन्हें वॉल्व बदलने की सख्त जरूरत है। इन मरीजों पर Lucknow TAVI Surgery विधि से वॉल्व इम्प्लांटेशन का परीक्षण किया जाएगा। सरकार की तरफ से हरी झंडी मिलते ही इसे बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया जाएगा।" — डॉ. संतोष सिन्हा   डॉ. सिन्हा ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश भर के चुनिंदा 9 अस्पतालों को इस विधि से इलाज करने के लिए चिन्हित किया है, जिनमें लखनऊ का हृदय रोग संस्थान भी शामिल है। यह उत्तर प्रदेश के लिए गर्व की बात है।   लाखों की बचत: 15 लाख का इलाज अब 0 रुपये में भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का महंगा होना आम आदमी की कमर तोड़ देता है। ऐसे में यह खबर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए संजीवनी समान है।   खर्च का गणित: निजी अस्पताल: यदि कोई मरीज किसी प्राइवेट हॉस्पिटल या कॉरपोरेट अस्पताल में TAVI विधि से वॉल्व बदलवाता है, तो उसका औसतन खर्च 15 लाख रुपये से 20 लाख रुपये के बीच आता है। वॉल्व की कीमत ही लाखों में होती है। सरकारी संस्थान (लखनऊ): डॉ. संतोष सिन्हा के अनुसार, हृदय रोग संस्थान में यह इलाज पूरी तरह से फ्री (Fully Free) रहेगा। किसे नहीं देना होगा शुल्क: सरकार से मिले निर्देशों के मुताबिक, चयनित मरीजों को वॉल्व की कीमत या सर्जरी का कोई भी शुल्क नहीं देना होगा। यह पूरा खर्च सरकार वहन करेगी।   यह कदम उन गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को नई जिंदगी देगा जो पैसों की कमी के कारण अपना इलाज बीच में ही छोड़ देते थे।   KGMU: सब कुछ तैयार, बस 'दिल' का इंतजार एक तरफ जहां हृदय रोग संस्थान में वॉल्व सर्जरी की नई शुरुआत हो रही है, वहीं दूसरी तरफ लखनऊ का प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) हार्ट ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ा है।   KGMU के सीवीटीएस (CVTS) विभाग ने हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम, अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर और सभी जरूरी उपकरण तैयार कर लिए हैं। लेकिन विडंबना यह है कि सारी तैयारियों के बावजूद अभी तक एक भी ट्रांसप्लांट नहीं हो पाया है। इसकी वजह है—अंगदान (Organ Donation) की कमी।   जागरूकता की कमी बनी रोड़ा KGMU की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि तकनीक और संसाधनों के स्तर पर विश्वविद्यालय पूरी तरह सक्षम है, लेकिन समाज में अभी भी अंगदान को लेकर भ्रांतियां और जागरूकता की कमी है।   "हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए 'ब्रेन डेड' (Brain Dead) मरीज के परिजनों की सहमति जरूरी होती है। दुखद है कि लोग अभी भी अंगदान के महत्व को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे हैं। एक व्यक्ति का अंगदान कई लोगों को नई जिंदगी दे सकता है।" — प्रो. सोनिया नित्यानंद, कुलपति, KGMU   जागरूकता अभियान: अब गांव-गांव पहुंचेंगे डॉक्टर अंगदान की इस खाई को पाटने के लिए KGMU प्रशासन ने एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। विश्वविद्यालय अब केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोगों के बीच जाकर उन्हें जागरूक करेगा।   क्या है रणनीति? कैंप और सेमिनार: लखनऊ और आसपास के जिलों में विशेष जागरूकता शिविर लगाए जाएंगे। सामाजिक संगठनों का सहयोग: डॉक्टरों के साथ-साथ एनजीओ (NGOs) और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद ली जाएगी। काउंसलिंग: अस्पतालों में ब्रेन डेड घोषित मरीजों के परिजनों की काउंसलिंग के लिए विशेष टीमें बनाई जाएंगी जो उन्हें अंगदान के लिए प्रेरित कर सकें। प्रस्ताव की तैयारी: इस अभियान को प्रभावी बनाने के लिए जल्द ही एक प्रस्ताव पारित किया जाएगा।   अन्य अंगों के प्रत्यारोपण में KGMU की प्रगति भले ही हार्ट ट्रांसप्लांट में डोनर की कमी आड़े आ रही हो, लेकिन अन्य अंगों के प्रत्यारोपण में KGMU ने बेहतरीन काम किया है।   लिवर और किडनी: वर्तमान में यहां लिवर (Liver) और किडनी (Kidney) ट्रांसप्लांट की सुविधा सुचारू रूप से चल रही है और सैकड़ों मरीजों को इसका लाभ मिला है। फेफड़ा प्रत्यारोपण (Lung Transplant): केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि जल्द ही फेफड़ा प्रत्यारोपण की सुविधा भी शुरू करने की तैयारी चल रही है। हार्ट ट्रांसप्लांट: अब जैसे ही कोई डोनर मिलेगा, सीवीटीएस विभाग पहला हार्ट ट्रांसप्लांट करके प्रदेश में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।   लखनऊ के चिकित्सा क्षेत्र में हो रहे ये बदलाव बताते हैं कि उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। हृदय रोग संस्थान में Lucknow TAVI Surgery का मुफ्त होना न केवल चिकित्सा विज्ञान की जीत है, बल्कि यह लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को भी मजबूत करता है। 15 लाख रुपये की बचत और चीर-फाड़ रहित इलाज निश्चित रूप से हजारों मरीजों की जान बचाएगा।   वहीं, KGMU की तैयारियां यह इशारा करती हैं कि भविष्य उज्ज्वल है, बस जरूरत है तो सामाजिक सोच में बदलाव की। अंगदान महादान है—इस मंत्र को जन-जन तक पहुंचाना अब केवल सरकार या डॉक्टरों की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि हम अंगदान के प्रति जागरूक होते हैं, तो न जाने कितने घरों के चिराग बुझने से बच सकते हैं।   लखनऊ के हृदय रोग संस्थान में दिल के वॉल्व की बीमारी का इलाज अब 'तावी' (TAVI) विधि से मुफ्त में किया जाएगा, जिसके लिए निजी अस्पतालों में 15 लाख रुपये लगते हैं। पहले चरण में 30 मरीजों का इलाज होगा। वहीं, KGMU में हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारियां पूरी हैं, लेकिन अंगदान (डोनर) न मिलने के कारण प्रक्रिया रुकी हुई है, जिसके लिए अब जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।

Unknown जनवरी 22, 2026 0
ncicon 2026 dehradun nutrition public health conference gdmc nci

देहरादून में 'NCICON 2026' का शंखनाद: स्वास्थ्य की दोहरी चुनौतियों पर मंथन के लिए जुटेंगे देश के शीर्ष वैज्ञानिक और चिकित्सा विशेषज्ञ

health ministry bans nimesulide above 100mg liver failure risk new guidelines 2025

सावधान! सरकार ने Nimesulide की 100mg से ज्यादा डोज वाली दवाओं पर लगाया बैन, लिवर फेलियर का खतरा

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सर्दियों का 'साइलेंट किलर': ठंड में क्यों उबलने लगता है खून? अगर कर रहे हैं ये 5 गलतियां, तो आप दे रहे हैं हार्ट अटैक को न्योता

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"नशा करते हैं तो सर्दियों में जरा बचकर!" डॉक्टरो की चेतावनी- कम उम्र में ही हो रहे ब्रेन स्ट्रोक-हार्ट अटैक के शिकार

सर्दियों के मौसम में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम तेजी से बढ़ जाते हैं। जिस तरह हार्ट अटैक (Heart Attack) के मामलों में वृद्धि होती है, उसी तरह ब्रेन स्ट्रोक (Brain Stroke) के मरीजों की संख्या में भी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है। डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि जो लोग शराब (Alcohol) का सेवन और धूम्रपान (Smoking) करते हैं, उन्हें सर्दियों में खास तौर पर सावधान रहने की जरूरत है। चौंकाने वाली बात यह है कि अब कम उम्र के लोग भी ब्रेन स्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं, जिसकी सबसे बड़ी वजह नशाखोरी है।READ ALSO:-दिल्ली ब्लास्ट: 'तीन कार बम' धमाके की थी साजिश! फरीदाबाद से उमर का रिश्तेदार फहीम गिरफ्तार, तीसरी कार 'ब्रेजा' भी बरामद   महिलाओं और पुरुषों में घटता अंतर चिकित्सकों के अनुसार, ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में पुरुषों और महिलाओं के बीच अब अधिक अंतर नहीं रह गया है।   लिंग अनुपात: लखनऊ के राम मनोहर लोहिया संस्थान के न्यूरोसर्जन डॉ. कुलदीप का कहना है कि लगभग 5 साल पहले ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में पुरुषों की संख्या अधिक होती थी, लेकिन अब महिलाओं की संख्या पुरुषों के लगभग बराबर पहुँच रही है। कारण: डॉ. कुलदीप के अनुसार, आज के समय में महिला हो या पुरुष, हर कोई नशे का सेवन कर रहा है, जिसके चलते दोनों वर्गों से मरीज आ रहे हैं।   15 दिनों में 53 मरीज, युवा वर्ग भी प्रभावित डॉ. कुलदीप ने बताया कि सर्दियों में रक्त का संचार उचित तरीके से नहीं हो पाता, जिससे ब्रेन स्ट्रोक के केस अधिक सामने आते हैं।   केस की संख्या: राम मनोहर लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में पिछले 15 दिनों में अब तक ब्रेन स्ट्रोक के 53 मरीज आ चुके हैं, जिसमें महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं। कम उम्र के शिकार: उन्होंने बताया कि संस्थान में युवा वर्ग के लोग भी काफी आ रहे हैं, जिन्हें ब्रेन स्ट्रोक पड़ रहा है। बड़ी वजह: इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि युवा वर्ग किसी न किसी तरीके का कोई न कोई नशा (अल्कोहल और स्मोकिंग) जरूर करते हैं, जो एक लंबे समय तक शरीर में बदलाव पैदा करता है।   क्यों पड़ता है ब्रेन स्ट्रोक? डॉ. कुलदीप ने ब्रेन स्ट्रोक के वैज्ञानिक कारणों को समझाया। यह तब होता है, जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त का प्रवाह बाधित होता है, जिससे मस्तिष्क के ऊतकों (Tissues) को ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं।   इस्केमिक स्ट्रोक: इसमें रक्त वाहिका में थक्का जम जाता है और रक्त प्रवाह को रोक देता है। रक्तस्रावी स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क में कोई रक्त वाहिका फट जाती है और रक्तस्राव होता है। मुख्य जोखिम: इन ब्लॉकेज या रक्तस्राव के मुख्य कारण हैं: उच्च रक्तचाप, धूम्रपान, मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोग।   स्वस्थ रहने के लिए क्या करें? केजीएमयू के न्यूरोसर्जन डॉ. रवि उनियाल ने Brain Stroke समेत अन्य गंभीर बीमारियों से बचने के लिए नियमित जांच और जीवनशैली में सुधार पर जोर दिया।   जरूरी जाँचें: उन्होंने कोलेस्ट्रॉल, ब्लड शुगर व ब्लड प्रेशर की जांच नियमित रूप से कराने की सलाह दी, ताकि बीमारी का शुरुआती चरण में ही पता चल सके। जीवनशैली में सुधार: डॉ. रवि उनियाल ने कहा कि आज के समय में नशा (धूम्रपान और अल्कोहल) नियंत्रित करने और जीवनशैली को बेहतर करने की सबसे ज्यादा जरूरत है। समय पर अस्पताल: उन्होंने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक के मरीज अक्सर इमरजेंसी में आते हैं, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच कराना सबसे जरूरी है।

Unknown नवम्बर 13, 2025 0
heart attack blood group risk study reveals

आपका ब्लड ग्रुप 'O' नहीं है? तो सावधान! स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा, इन 3 ब्लड ग्रुप वालों को है हार्ट अटैक का सबसे ज्यादा खतरा

“Deadly Habit: Sitting is the New Smoking, 2-Minute Break Every 30 Minutes Can Save Life”

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शरीर में प्लेटलेट्स का गणित: अगर आपके खून में भी 1 से 1.5 लाख के बीच रहते हैं प्लेटलेट्स तो क्या ये खतरे की बात है?

हमारे शरीर में खून का सही संतुलन बनाए रखना बेहद ज़रूरी है, और इसमें प्लेटलेट्स की अहम भूमिका होती है। चोट लगने पर खून का बहाव रोकने से लेकर घाव भरने तक, ये छोटे-छोटे सेल्स कई बड़े काम करते हैं। आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति के खून में इनका स्तर 1.5 लाख से 4.5 लाख प्रति माइक्रो लीटर के बीच होता है। लेकिन, कुछ लोगों में यह स्तर हमेशा 1 लाख से 1.5 लाख के बीच ही रहता है। ऐसे में कई बार लोग घबरा जाते हैं। इस विषय पर मीडिया से बातचीत में मैक्स अस्पताल में हेमेटोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. रोहित कपूर और आरएमएल हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग के डॉ. सुभाष गिरि से बात की।READ ALSO:-बेंगलुरु में ट्रैफिक जाम से जंग जीतकर मेट्रो से दौड़ा 'जीवन': डॉक्टरों ने हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए अपनाया अनूठा तरीका   प्लेटलेट्स क्या होते हैं और इनका काम क्या है? प्लेटलेट्स शरीर की बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में बनने वाले छोटे-छोटे सेल्स होते हैं। इनका मुख्य काम खून का थक्का बनाना होता है। जब भी शरीर में कोई चोट लगती है, तो प्लेटलेट्स एक साथ मिलकर खून के बहाव को रोकते हैं। इनका काम इतना महत्वपूर्ण है कि इनकी संख्या अगर तय मानक से बहुत कम (20 से 30 हजार से भी कम) हो जाए तो व्यक्ति की जान को खतरा हो सकता है।   शरीर में प्लेटलेट्स क्यों कम हो जाती हैं? डॉ. रोहित कपूर बताते हैं कि प्लेटलेट्स के कम होने के कई कारण हो सकते हैं: बोन मैरो की बीमारियां: अप्लास्टिक एनीमिया, ल्यूकेमिया और मायलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम जैसी स्थितियां बोन मैरो को नुकसान पहुंचा सकती हैं। विटामिन की कमी: फोलेट और विटामिन B12 जैसे विटामिन की कमी भी प्लेटलेट्स के निर्माण पर असर डाल सकती है। संक्रमण: हेपेटाइटिस C और HIV जैसे कुछ वायरल संक्रमण भी बोन मैरो के काम को सीधे प्रभावित करते हैं। डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां भी प्लेटलेट्स को तेजी से कम कर सकती हैं।   प्लेटलेट्स का लेवल: कम होने पर क्या करें? डॉ. रोहित के अनुसार, प्लेटलेट्स के लेवल के आधार पर ही इलाज किया जाता है: हल्की कमी (1,01,000 - 1,50,000): इस स्थिति में आमतौर पर इलाज की जरूरत नहीं होती। अगर यह स्तर हमेशा बना रहता है तो कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन हर तीन महीने में जांच कराना उचित होता है। गंभीर स्थिति (50,000 से कम): यह एक गंभीर स्थिति है और तत्काल चिकित्सा की आवश्यकता होती है। अगर काउंट 10,000 से कम हो जाए तो यह जानलेवा हो सकता है और ब्लीडिंग का खतरा रहता है।   क्यों कुछ लोगों में 1 से 1.5 लाख का लेवल ही रहता है? डॉ. रोहित बताते हैं कि कुछ लोगों में जन्म से ही प्लेटलेट्स की संख्या एक से डेढ़ लाख के बीच हो सकती है। मेडिकल भाषा में इसे 'Constitutional Thrombocytopenia' कहा जाता है। ऐसे लोगों में यह काउंट सालों तक स्थिर रहता है और यह किसी बीमारी का संकेत नहीं होता है। हालांकि, अगर किसी का प्लेटलेट्स लेवल 1 लाख से नीचे चला जाए और इसके साथ ही हीमोग्लोबिन और टीएलसी भी कम हो तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है, जिसके लिए तुरंत जांच करानी चाहिए।   कब कराएं प्लेटलेट्स की जांच और कौन सा टेस्ट है जरूरी? डॉ. सुभाष गिरि बताते हैं कि प्लेटलेट्स कम होना हमेशा डरने की बात नहीं है, लेकिन इसे हल्के में भी नहीं लेना चाहिए। सही समय पर टेस्ट और डॉक्टर की सलाह से स्थिति संभाली जा सकती है। सबसे आम टेस्ट: शरीर में प्लेटलेट्स काउंट की जांच के लिए सबसे आम टेस्ट CBC (Complete Blood Count) है। अगर शरीर में हमेशा थकावट या कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होते हैं तो यह टेस्ट करा लेना चाहिए। यह एक बेसिक और सस्ता टेस्ट है जो स्वास्थ्य की कई जानकारी दे देता है। बोन मैरो टेस्ट की जरूरत: यह जांच आमतौर पर तब की जाती है जब प्लेटलेट्स की संख्या 50,000 से भी कम हो जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं ब्लड कैंसर तो नहीं है। हालांकि, कम काउंट होने का मतलब यह कतई नहीं है कि कैंसर ही हो।   क्या घरेलू नुस्खों से बढ़ जाते हैं प्लेटलेट्स? डॉ. सुभाष इस पर कहते हैं कि न तो बकरी का दूध और न ही पपीते के पत्तों से प्लेटलेट्स बढ़ने का मेडिकल साइंस में कोई प्रमाण है। ऐसे में इन पर भरोसा न करें। यदि प्लेटलेट्स का स्तर 1 लाख से नीचे है तो डॉक्टर से सलाह लें और सही इलाज कराएं। सही समय पर टेस्ट और ट्रीटमेंट से बीमारी को काबू में किया जा सकता है।  

Unknown सितम्बर 12, 2025 0
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